धर्म संदेश:पाप का प्रदूषण दूर कर आत्मा का आभूषण बनता है पर्युषण

नीमचएक वर्ष पहले
  • कॉपी लिंक
  • पर्वाधिराज पर्युषण पर्व के पहले दिन विकास नगर में प्रवचन देते हुए मुनिश्री संयमरत्न विजयजी ने कहा

कर्तव्य पालन का आनंद जिसके हृदय में समाप्त नहीं होता, कर्तव्य पथ पर चलते हुए जो कठिनाइयों को नहीं देखता और दूसरों का भला करने में जिसे सुख मिलता है वही वंदनीय, दर्शनीय, स्मरणीय होते हैं। यह बात पर्वाधिराज पर्युषण पर्व के प्रथम दिवस मुनिश्री संयमरत्न विजयजी ने कर्तव्यों के विषय में समझाते हुए कहीं। विकास नगर स्थित श्री जैन श्वेतांबर महावीर जिनालय ट्रस्ट के तत्वावधान में आचार्यश्री जयन्तसेनसूरिजी के सुशिष्य मुनिश्री संयमरत्न विजयजी व मुनिश्री भुवनरत्न विजयजी चातुर्मास के लिए विराजित है। रविवार को पर्वाधिराज पर्युषण पर्व के पहले दिन मुनिश्री संयमरत्न विजयजी ने कहा कि पर्युषण पर्व हमारे पाप प्रदूषण को दूर कर हमारी आत्मा का आभूषण बनता है। पर्युषण हमें कर्मों के बंधन से आजाद कराने आया है। जिस तरह देश को आजाद कराने में जो शहीद हुए उनको हम भूल नहीं सकते, वैसे ही हमें कर्मों की गुलामी से मुक्त कराने वाले पर्युषण पर्व नहीं भूल सकते। पर्युषण पर्व के आठ दिनों में की जाने वाली आराधनाओं से अष्टकर्मों का क्षय होता है। यह पर्व जीव को भविष्य में दुर्गति व वर्तमान में दुर्भाव से बचाता है। पर्व के दिनों में तप-त्याग से शुभ आयुष्य कर्म का बंध होता है, जिससे जीव सद्गति प्राप्त करता है। प्रदूषित मन को शुद्ध करने के लिए पर्युषण में कर्तव्यों का पालन किया जाता है।

अन्न को देवता कहा गया है, जूते-चप्पल पहनकर खड़े-खड़े भोजन करना मूर्खता व पशुता की निशानी है

प्रथम कर्तव्य है-”अमारी प्रवर्तन” अर्थात् जीव-दया का पालन करना, अहिंसा का पालन करने से हिंसक प्रवृत्ति दूर होती है। दूसरा- “साधर्मिक भक्ति” कमजोर भाई-बहनों को आर्थिक,शारीरिक व सामाजिक दृष्टि से सक्षम बनाना। ऐसा करने से परस्पर एक-दूसरे के प्रति प्रेम भाव बढ़ता है। स्वामी भक्ति करने वाला भक्ति करते समय स्वामी भाई को बड़ा मानता है। जिस तरह श्रीकृष्णजी ने सुदामा को अपने सिंहासन पर बैठाया और खुद नीचे बैठकर चरण धोए थे। अन्न को देवता कहा गया है, इसलिए कभी भी जूते-चप्पल पहनकर भोजन नहीं करना चाहिए। खड़े-खड़े भोजन करना मूर्खता व पशुता की निशानी है। एक वृक्ष ऐसा लगाया जाए जिसकी छाया पड़ोसी के घर तक जाए,यदि वह रहे भूखा तो मुझसे भी न खाया जाए-ऐसे भाव हमारे भीतर होना चाहिए। तीसरा-”क्षमापना” सभी जीवों को क्षमा करना व स्वयं क्षमा माँगना,इससे मित्रता बढ़ती है।जिसके पास क्षमा रूपी शस्त्र होता है,उसका शत्रु कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता। चौथा-”अट्ठम तप, से’आहार संज्ञा’ पर विजय प्राप्त होती है, भोजन से आसक्ति हटकर भजन भक्ति में मन लगता है। भोजनानंदी कभी भजनानंदी नहीं होता,भोजनानंदी भवाभिनंदी होकर भटकता रहता है।पांचवां-”चैत्यपरिपाटी” अर्थात् प्रभु दर्शन से परमात्म स्वरूप की प्राप्ति होती है। चारित्र से गिरा हुआ प्राणी फिर भी एक बार तीर सकता है, लेकिन दर्शन से पतीत हुआ प्राणी का उत्थान संभव नहीं। जिसका दृष्टिकोण सही है,वह सर्वत्र गुणों को ही देखता है। नजर के बदलते ही नजारे भी बदल जाते हैं।

खबरें और भी हैं...