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अमृतमय धूलि:जहां श्रद्धा और भावना का योग होता है, वहां धूलि भी अमृत बन जाती है

नीमच12 दिन पहले
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जिसका देह भीषण जलोदर रोग के भार से झुक गया है, जो शोचनीय दशा को प्राप्त हो गया है, जो जीवन जीने की आशा छोड़ चुका है, ऐसा मनुष्य भी यदि आपके चरण कमल की अमृतमय धूलि को अपने शरीर पर लगाता है, तो वह भी कामदेव के समान सुंदर रूपवान हो जाता है। जहां श्रद्धा और भावना का योग होता है, वहां धूलि भी अमृत बन जाती है। मीरा के लिए राणा द्वारा भेजा गया विष का प्याला भी श्रीकृष्ण की भक्ति व श्रद्धा के प्रभाव से अमृत में बन गया था। यह बात मुनिश्री संयम रत्न विजयजी ने कहीं। आराधना भवन में बुधवार को मुनिश्री संयम रत्न विजयजी ने भक्तामर का भावार्थ समझाते हुए कहा कि आस्था का रास्ता यदि सही हो तो हमें मुक्ति मंजिल तक पहुंचने में कोई भी बाधक नहीं बन सकता। प्रभु “चरण-रज’ के स्पर्श से मानव बाहर से ही नहीं अपितु भीतर से भी सुंदर बन जाता है। मानव देह का आभूषण रूप है, रूप का आभूषण गुण है, गुण का आभूषण ज्ञान है और ज्ञान का आभूषण क्षमा है। जन्म और मृत्यु दुनिया के दो महारोग है, जिससे प्रत्येक प्राणी पीड़ित है। डॉक्टर रोग का उपचार कर सकते हैं, लेकिन मृत्यु का नहीं। मृत्यु का तो एक ही उपचार है और वह है-मोक्ष। मृत्यु रोग है, तो जन्म भी रोग है।

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