हौसले की जीत:ब्लड डोनेशन की अलख जगाई, 150 से ज्यादा महिलाओं से अब तक करवा चुकीं रक्तदान

रतलाम9 महीने पहलेलेखक: जितेंद्र श्रीवास्तव
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मेघा सोलंकी । - Dainik Bhaskar
मेघा सोलंकी ।
  • शिविर में मिली मायूसी तो घर-घर जाकर छेड़ा जागरुकता अभियान

रक्तदान-महादान। लेकिन इस स्लोगन के बावजूद लोगों के मन में डर है कि रक्तदान करने से कमजोरी आती है। वहीं कई भ्रांतियां भी हैं। खासकर युवतियों एवं महिलाओं के मन में। इससे रक्तदान करने वाली महिलाओं की संख्या कम होती है लेकिन रतलाम की एक युवती ऐसी भी है जो महिलाओं के मन में ये भ्रांतियां दूर कर रही हैं और उन्हें रक्तदान करने के लिए प्रेरित भी। युवती की इसी प्रेरणा से गांव की 150 युवतियां एवं महिलाएं अभी तक रक्तदान कर चुकी हैं।

ये युवती है जिले के बड़ावदा गांव की मेघा सोलंकी। मेघा बड़ावदा सेवा समिति की महिला प्रकोष्ठ की अध्यक्ष भी हैं। खून की कमी दूर करने के लिए समिति द्वारा समय-समय पर रक्तदान शिविर रखे जाते हैं। इन शिविरों में महिलाओं की तादाद बढ़े इसके लिए शिविर के पहले मेघा गांव में युवतियों एवं महिलाओं के घरों पर पहुंच उन्हें रक्तदान का महत्व समझाती हैं और प्रेरित कर रही हैं।

उनकी समझाइश से गांव की युवती और महिलाएं भी रक्तदान करने के लिए आगे आ रही हैं। मेघा की समझाइश बड़ावदा तक सीमित नहीं है। वे आसपास के गांवों जैसे बरखेड़ी, सेंदरी, फाचरिया, कलालिया में भी महिलाओं को रक्तदान के लिए प्रेरित कर चुकी हैं। कोरोना काल में बड़ावदा के साथ ही अन्य गांवों में शिविर रखे। इसमें महिलाएं रक्तदान के लिए आगे आईं।

बचपन में ब्लड की जरूरत पड़ी तो शुरू किया महिलाओं को रक्तदान के लिए प्रेरित करना
मेघा जब 10 साल की थी तब शरीर में खून की कमी हो गई। बड़ी मशक्कत से रक्त की व्यवस्था हो पाई। मेघा के पिता जीएस सोलंकी खजुरिया में पंचायत सचिव हैं। वे समय-समय पर यह बात मेघा को बताते थे। इस पर मेघा ने यह शुरुआत की और ठाना कि किसी को भी रक्त की कमी नहीं आना चाहिए और सभी को समय पर ब्लड मिलना चाहिए। इसके बाद खुद तो ब्लड दिया। अब अन्य महिलाओँ को भी प्रेरित कर रही है ताकि ब्लड के कारण किसी की जान ना जाए। मेघा खुद भी चार बार ब्लड दे चुकी हैं।

कई बार तो शिविर में महिलाएं आईं भी नहीं, फिर भी हार नहीं मानी और दोबारा समझाने पहुंच गईं

मेघा बताती हैं कि वे गांवों में होने वाले ब्लड शिविर के पहले महिलाओं एवं युवतियों को समझाती हैं लेकिन कई तरह की दिक्कतें आती हैं। कई बार तो युवतियों एवं महिलाओं को समझाया लेकिन स्थिति यह बनी कि एक भी महिला नहीं पहुंची। इसके बाद उनके घर पर जाकर फिर समझाया और उन्हें परिवार का हवाला दिया।

बताया कि आपके परिवार में कल से किसी को कुछ हो गया और ब्लड की जरूरत पड़ी तो आप ही आगे नहीं आ रही है तो कौन आगे आएगा तो कहीं जाकर मानीं। मेघा की समझाइश के बाद कई तो ऐसी भी युवती और महिला हैं जो जागरूक होने के बाद दो से तीन बार रक्तदान कर चुकी हैं। वहीं राधा परिहार, नेहा सिसौदिया, खुशी सिसौदिया तो साथ में ही जुड़ गई और मेघा के साथ महिलाओं को जागरूक करना शुरू कर दिया।

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