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अपूर्व फल का योग:सर्वपितृ अमावस आज, कल से मलमास

रतलाम9 दिन पहले
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  • दान नहीं कर पाने की स्थिति में संतों व ब्राह्मणों की सेवा करें

मलमास (पुरुषोत्तम मास) 18 सितंबर से शुरू होने जा रहा है। अधिक मास में चंद्रमा आदि ग्रहों द्वारा अपूर्व फल की संभावना बनने लगती है, क्योंकि इस समय आध्यात्मिक देवी क्रियाओं, ध्यान, जप, दान द्वारा अधिक मास में जीवन की अनेक समस्याएं दूर हो जाती हैं। व्यक्ति इस लोक में सुख समृद्धि के साथ अंत में गोलोक को प्राप्त करता है । 12 महीनों में भगवान श्री विष्णु ने इसे सर्वश्रेष्ठ मास के रूप में बताया है। अधिक मास में फल प्राप्ति की कामना से किए जाने वाले सभी कार्य वर्जित माने गए हैं। इसमें निष्काम भाव से ही कार्यों में रत रहना चाहिए। यदि किसी कारण इस मास दान पुण्य नहीं किया जा सके तो ब्राह्मणदेव तथा संतों की सेवा अवश्य करनी चाहिए।

19 सालों बाद दो आश्विन मास
इस बार आश्विन मास 59 दिन का रहेगा। जिसका आरंभ 3 सितंबर से होकर 31 अक्टूबर तक रहेगा। इसमें 18 सितंबर से 16 अक्टूबर तक आश्विन अधिकमास, पुरुषोत्तम (अधिकमास) रहेगा। इस अधिकमास के चलते आगामी सितंबर से दिसंबर तक होने वाले त्योहार 10 से 15 दिन की देरी से आएंगे। इससे पूर्व आश्विन अधिक मास 19 साल पहले 18 सितंबर से 16 अक्टूम्बर के बीच 2001 में आया था।
तीन साल में एक बार आता है अधिकमास : हिंदू कैलेंडर में हर तीन साल में एक बार एक अतिरिक्त माह आता है जिसे अधिकमास कहा जाता है। इसे मलमास या पुरुषोत्तम मास के नाम से जाना जाता है। हिंदू धर्म शास्त्रों में इस मास को विशेष महत्वपूर्ण माना जाता है। इस पूरे मास में पूजा-पाठ, भगवतभक्ति, व्रत-उपवास, जप और योग आदि धार्मिक कार्यों का सामान्य दिनों की अपेक्षा 10 गुना अधिक फल प्राप्त होता हैं।
हर तीन साल में क्यों आता है अधिकमास : वशिष्ठ सिद्धांत के अनुसार अधिकमास चंद्र वर्ष का एक अतिरिक्त भाग है, जो हर 32 माह, 16 दिन और 8 घटी के अंतर से आता है। इसका प्राकट्य सूर्य वर्ष और चंद्र वर्ष के बीच अंतर का संतुलन बनाने के लिए होता है। भारतीय गणना पद्धति के अनुसार प्रत्येक सूर्य वर्ष 365 दिन और करीब 6 घंटे का होता है, वहीं चंद्र वर्ष में 354 दिन होते है। दोनों वर्षों के बीच लगभग 11 दिनों का अंतर होता है, जो हर तीन वर्ष में लगभग 1 मास के बराबर हो जाता है।

भक्त भजन-कीर्तन करते हैं : पंडित संजयशिवशंकर दवे ने बताया कि अधिकमास में हिंदू श्रद्धालु व्रत- उपवास, पूजा- पाठ, ध्यान, भजन, कीर्तन, मनन को अपनी जीवनचर्या बनाते हैं। पौराणिक सिद्धांतों के अनुसार इस मास के दौरान यज्ञ- हवन के अलावा श्रीमद् देवीभागवत, श्री भागवत पुराण, श्री विष्णु पुराण, भविष्योत्तर पुराण आदि का श्रवण, पठन, मनन विशेष रूप से फलदायी होता है। अधिकमास के अधिष्ठाता भगवान विष्णु हैं, इसीलिए इस पूरे समय में विष्णु मंत्रों का जाप विशेष लाभकारी होता है।

मलमास क्यों कहा गया
हिंदू धर्म में अधिकमास के दौरान सभी पवित्र कर्म वर्जित माने गए हैं। इस मास के दौरान हिंदू धर्म के विशिष्ट व्यक्तिगत संस्कार जैसे नामकरण, यज्ञोपवीत, विवाह और सामान्य धार्मिक संस्कार जैसे गृहप्रवेश, नई बहुमूल्य वस्तुओं की खरीदी आदि आमतौर पर नहीं किए जाते हैं। मलिन मानने के कारण ही इस मास का नाम मलमास पड़ गया है।

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