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धर्मिक आयोजन:व्यक्ति इस संसार में विस्तार तो करता है, पर विभाजन की दीवारें खींच लेता है:मैथिलीशरण

छतरपुर24 दिन पहले
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  • जवाहर रोड स्थित बुंदेलखंड गैरेज में 7 दिवसीय रामकिंकर प्रवचन माला शुरू

भगवान श्रीराम का स्वभाव ऐसा है कि बैरी भी उनकी बढ़ाई करते हैं, श्रीराम अपना काम करते हुए भी यह ध्यान रखते हैं कि उसमें भी दूसरों का हित हो। यह बात कल्याण दास धर्मशाला एवं चैरिटेबल ट्रस्ट द्वारा बुंदेलखंड गैरेज में आयोजित सात दिवसीय रामकथा के पहले दिन संत मैथिलीशरण भाई ने कही।

उन्होंने भगवान के स्वभाव की व्याख्या करते हुए कहा कि जीवन में विस्तार करना प्रभु राम से सीखिए। व्यक्ति संसार में विस्तार तो करता है, पर वह कहीं न कहीं विभाजन की दीवारें खींच लेता है। सूर्य और चांद का विस्तार सर्वत्र होने के बावजूद उन्होंने कहीं कोई भेदभाव नहीं किया। राजा दशरथ स्वयं कहते हैं की राम का स्वभाव ऐसा है कि मेरे बैरी भी उनकी बढ़ाई करते हैं। उन्होंने बताया कि भगवान राम दो बार अयोध्या से बाहर गए। दोनों बार ही वह भले तीन की संख्या में अयोध्या राज के बाहर गए हों, पर जब वह वापस लौटे तो अनेकों लोगों को जोड़ कर लौटे।

पहली बार वह भाई लक्ष्मण और ऋषि विश्वामित्र के साथ अयोध्या के बाहर गए तो मिथिला से नाता जोड़ कर वापस लौटे। दूसरी बार भार्या सीता और भाई लक्ष्मण के साथ वनवास पर गए तब भी सुदूर दक्षिण तक ऋषि-मुनियों, वनवासियों, वनचरों, निशाचरों से अपने मजबूत रिश्ते बनाकर वापस लौटे। संसार में अपने प्रभाव और स्वभाव के विस्तार का इससे अच्छा उदाहरण और कोई नहीं हो सकता। यदि व्यक्ति अपनी माया के विस्तार से दुखी है तो उसे समझ लेना चाहिए कि उसके व्यवहार में कहीं न कहीं कोई कमी जरूर है। कोई भी साधना और भजन सद्व्यवहार के बिना अपूर्ण है। भजन का प्रमाण यही है वह हमारे जीवन में आ जाए।

भौमिक और सनातन व्याख्या वहीं है जिसमें सबका कल्याण हो, मन, वचन व कर्म से कोई दुखी न हो

मैथिलीशरण ने कहा कि सार्व भौमिक और सनातन व्याख्या यह है जिसमें सब का कल्याण हो। मन, वचन व कर्म से किसी को दुख न पहुंचे, हम उस मार्ग पर चलें। उन्होंने कहा कि भजन करने के लिए संसार को छोड़ने की जरूरत नहीं है, क्योंकि सब कुछ छोड़कर साधना तो हो सकती है, पर भजन नहीं हो सकता। भगवान राम वानरों को अपने पास से किष्कंधा लौटाते हुए बड़ा ही अच्छा संदेश देते हैं। भाईजी ने कहा पूजन और प्रवचन के पहले और बाद में व्यक्ति द्वारा किए जाने वाले कार्य ही उसके भजन का सच्चा प्रमाण हैं। प्रभु श्रीराम अंगद को अपनी माला पहना निर्भय कर आग्रह पूर्वक किष्कंधा के लिए विदा करते हैं।

भगवान से करें प्रेम और संसार पर करें विश्वास
मैथिलीशरण ने अपने गुरु रामकिंकर के साथ का संस्मरण सुनाते हुए कहा कि उन्होंने जब अपने गुरु से पूछा कि क्या वह उनसे प्रेम करते हैं तो रामकिंकर ने कहा था कि नहीं हम तुम पर विश्वास करते हैं, प्रेम तो सिर्फ भगवान से करते हैं। भाई ने कहा कि यही एक बहुत बड़ा संदेश है कि हमें संसार पर विश्वास करना चाहिए, पर प्रेम भगवान से करना चाहिए। कथा की शुरुआत पर लखनलाल असाटी ने महाराज और श्रोताओं का स्वागत किया। इसके बाद युग तुलसी रामकिंकर की आरती और व्यासपीठ का पूजन जयनारायण अग्रवाल द्वारा किया गया। इस अवसर पर अपर कलेक्टर भारत भूषण गंगेले, कृपा शंकर तिवारी, स्टेट बैंक मैनेजर सत्य प्रकाश झा सहित सैकड़ों श्रद्धालु मौजूद रहे।

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