दिहाड़ी मजदूर की बेटी बनी MP टॉपर:बोली-जो चौका-चूल्हा करने का ताना देते थे, उन्हें दे दिया जवाब; पढ़ें संघर्ष

राजेश चौरसिया, छतरपुर5 महीने पहले

MP बोर्ड के 10वीं रिजल्ट शुक्रवार को घोषित कर दिए गए। छतरपुर की नैंसी दुबे ने 10वीं बोर्ड परीक्षा में 496 मार्क्स हालिस कर पूरे प्रदेश में टॉप स्थान हासिल किया। नैंसी एक्सीलेंस स्कूल की छात्रा है। वह 5 भाई-बहनों में तीसरे नंबर की बहन हैं। नैंसी के पिता एक किराना दुकान पर दिहाड़ी मजदूर हैं। उन्होंने अपनी सफलता का श्रेय मम्मी-पापा, टीचर्स खासकर अपनी बड़ी बहन वैशाली को दिया। दैनिक भास्कर ने प्रदेश की दसवीं टॉपर से बात की और उनकी सफलता के पीछे की पूरी कहानी जानी। पढ़िए उसी की जुबानी

मैं रोजाना 5 से 6 घंटे पढ़ती थी। टीचर्स ने मुझे पूरा सपोर्ट किया। अगर कुछ समझ नहीं आ रहा और उन्हें मैंने कॉल किया तो वह हमेशा ठीक से समझाते थे। इसके अलावा यू-ट्यूब से भी मैंने पढ़ाई की थी। कोरोना का समय था, स्कूल ज्यादातर बंद ही रहे। मेरे पापा किसान हैं। मम्मी हाउसवाइफ हैं। हमारी आर्थिक स्तिथि ठीक नहीं है। मैं कोचिंग भी ज्वाइन नहीं कर पाई। मैंने सेल्फ स्टडी ही की। ठंडी, गर्मी हो या बरसात मैं रोज 12 KM साइकिल चला कर स्कूल आती-जाती थी। पढ़ाई में सबसे ज्यादा इंपोर्टेंट है कंसीसटेंसी। मतलब रोज पढ़ना और इसी से सफलता मिलती है।

अपने परिवार के साथ 10वीं की टॉपर नैंसी दुबे
अपने परिवार के साथ 10वीं की टॉपर नैंसी दुबे

मां बोलीं-बेटी होशियार, मैं नि:शब्द

वहीं, नैंसी की मम्मी संगीता दुबे के आसूं थमने का नाम नहीं ले रहे। उन्होंने बताया कि बेटी पढ़ने में काफी होशियार थी, लेकिन वह MP टॉप कर जाएगी यह नहीं सोचा था। इतनी खुशी हो रही है कि मैं कुछ बोल नहीं सकती। हमारी चारों बिटिया अच्छी पढ़ती हैं। हमारी बड़ी बेटी तो PSC की तैयारी कर रही है।

बहन बोलीं- माता-पिता ने गांव के बाहर पढ़ने भेजा

बहन वैशाली दुबे ने बताया कि हमारी मम्मी ने पहले ही सोचा था कि अपने सभी बच्चों को पढ़ाना ही है। पापा सुबह-सुबह ही काम पर निकल जाते थे, हमलोग छोटे थे इसलिए वह हमें स्कूल छोड़ने के लिए घर आते थे। हमें स्कूल छोड़कर वापस काम पर जाते थे। ऐसे ही छुट्टी के समय स्कूल से हमें घर छोड़कर वापस काम पर चले जाते थे। गांव में हम ही पहले थे जिसने 8वीं के बाद भी पढ़ाई की। 8वीं के बाद की पढ़ाई गांव से 6-7 KM दूर होती थी। इसलिए कोई भी अपने बच्चे को स्कूल नहीं भेजता था। लेकिन हमारे मम्मी-पापा ने हमें गांव से बाहर भेजा। गांव के लोग उन्हें उलाहना देते थे कि क्यों बेटियों को बाहर भेज रही है, पढ़ाई-लिखाई से कुछ नहीं होगा, इन्हें चौका-चुल्हा ही करना है। हमारे गांव में 2-3 लोगों को छोड़कर अभी तक कोई ऐसा नहीं है, जो गांव के बाहर जाकर पढ़ाई कर रहीं हों।

पिता किराने की दुकान पर काम करते हैं।
पिता किराने की दुकान पर काम करते हैं।

5 रुपए दिहाड़ी मिलती थी

पिता ने बताया कि 5 रुपए दिहाड़ी मिलती थी लेकिन कभी भी बच्चों को कमी महसूस नहीं होने दी, उन्हें सारी सुविधाएं उपलब्ध कराईं। मुझे साढ़े 9 हजार रुपए महीने किराने की दुकान पर मिलते हैं। बिटिया ने टॉप किया इसलिए बहुत खुशी हो रही है।