पाएं अपने शहर की ताज़ा ख़बरें और फ्री ई-पेपर

Install App

Ads से है परेशान? बिना Ads खबरों के लिए इनस्टॉल करें दैनिक भास्कर ऐप

नवरात्रि:500 फीट ऊंचे पर्वत के शिखर पर विराजमान हैं माता बंबरवैनी, 360 सीढ़ियां चढ़कर श्रद्धालु दर्शन करने पहुंचते हैं

छतरपुर/लवकुशनगरएक महीने पहले
  • कॉपी लिंक
  • कोरोना के चलते कम पहुंच रहे श्रद्धालु

लवकुशनगर में करीब 500 फीट ऊंचे विशाल पर्वत शिखर पर विराजमान माता बंबरवैनी बुंदेलखंड क्षेत्र के प्रसिद्ध सिद्धतीर्थ स्थलों में से एक एवं लाखों लोगों की श्रृद्धा और आस्था का केंद्र है। 360 सीढ़ियां चढ़कर श्रृद्धालु माता के दर्शन करने पहुंचते हैं। नवरात्रि पर्व पर रोज सैकड़ों की संख्या में दूर दूर से श्रद्धालु आकर मातारानी के दर्शन करने आ रहे हैं। हालांकि इस वर्ष शारदेय नवरात्रि में यहां भी कोरोना का असर देखा जा रहा है।

पिछले वर्ष की अपेक्षा इस वर्ष कोरोना संक्रमण के भय से श्रद्धालुओं की संख्या कम गई है। शारदेय नवरात्रि के अवसर पर पूरे दिन श्रद्धालुओं की खासी भीड़भाड़ रहती है। सुबह 4 बजे से देर शाम तक दर्शनार्थियों का आना जाना जारी है। श्रद्धालु अपनी मनोकामना पूरी होने पर यहां कन्या भोज, भंडारा, कथा, अनुष्ठान आदि करवाते हैं। पुरुषोत्तम मास पर मंदिर परिसर में सवा महीने की संगीतमय अखंड रामधुन चल रही है। जिसका समापन पूर्णाहुति एवं दशहरा मिलन के साथ होगा।

किवदंती : पहाड़ पर स्थित है बाल्मीकि आश्रम

माता बंबरवैनी का इतिहास त्रेता युग से जुड़ा हुआ है। पहाड़ पर महर्षि वाल्मीकि का आश्रम भी है, किवदंती के अनुसार भगवान श्रीराम द्वारा माता सीता का निष्कासन किए जाने के बाद वह यहां बाल्मीकि आश्रम में रहीं। यहां आश्रम में ही लव-कुश का जन्म हुआ।

मंदिर के नीचे गुफा में माता की रसोई भी जीर्णशीर्ण हालत में है। इसकी जीवंत गवाही पहाड़ के नीचे स्थित लवकुश जी का मंदिर भी देता है। माता सीता को महर्षि बाल्मीकि ने “वन देवी’ नाम दिया था। लोग कहते हैं कि वन देवी का अपभ्रंश होकर बंबरवैनी हो गया। माता बंबरवैनी को माता सीता का रूप माना जाता है।

इतिहास: पन्ना के महाराज हिंदूपत ने कराया था निर्माण

प्रसिद्ध इतिहासकार डा.काशीप्रसाद त्रिपाठी की पुस्तक “बुंदेलखंड का वृहद इतिहास’ में उल्लेख है कि स्वप्न मिलने पर तत्कालीन पन्ना महाराज हिंदूपत ने 1758-76 ईश्वी के मध्य माता बंबरवैनी के मंदिर का निर्माण कराया था। मंदिर के अंदर छोटे कुंड में लोग श्रृद्धापूर्वक दूध, पुष्प व बतासा अर्पित करते हैं। पहाड़ के उत्तुंग शिखर पर एक चट्‌टान पर छोटे से कुंड यानि विवर में माता बंबरबैनी लेटी मुद्रा में प्रकट हुई थीं। इसीलिए उनका नाम विवरबैनी, इसके बाद अपभ्रंश होकर बंबरबैनी हो गया।

सीता बनवास से जुड़ा हुआ है इतिहास

मां बंबरबैनी विकास समिति के सदस्य मातादीन विश्वकर्मा बताते हैं कि किवदंतियों के अनुसार रावण वध के बाद अयोध्या लौटने पर एक व्यक्ति के लांछन लगाने पर भगवान श्रीराम ने सीता जी का त्याग कर दिया था। इसी पर्वत पर महर्षि बाल्मीकि के आश्रम में माता सीता ने लव-कुश को जन्म दिया।

संभवत: बुंदेलखंड में इकलौता लवकुश मंदिर यहां स्थित है। महर्षि आश्रम में सीता जी को वनदेवी नाम मिला, वनदेवी ही माता सीता के रूप में स्थापित हैं। चट्‌टान पर छिद्र/ बिवर में प्रकट होने से उन्हें बिवरबैनी कहा गया, जो अपभ्रंश होकर बंबरबैनी हो गया।

आज का राशिफल

मेष
Rashi - मेष|Aries - Dainik Bhaskar
मेष|Aries

पॉजिटिव- पिछले रुके हुए और अटके हुए काम पूरा करने का उत्तम समय है। चतुराई और विवेक से काम लेना स्थितियों को आपके पक्ष में करेगा। साथ ही संतान के करियर और शिक्षा से संबंधित किसी चिंता का भी निवारण होगा...

और पढ़ें