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प्रवचन:आत्मा का संबंध स्वर्ग, नर्क और मोक्ष से है, इसीलिए भोजन और पानी की शुद्धता का ध्यान रखें: आचार्य निर्भय सागर

 छतरपुरएक वर्ष पहले
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  • वैज्ञानिक संत ने गुरुवार की सुबह शहर में डेरा पहाड़ी स्थित जैन मंदिर में मौजूद अपने शिष्यों से कहा

भोजन और पानी का संबंध शरीर से, शरीर का संबंध ग्रंथियों से, ग्रंथियों का संबंध हमारे मन से और मन का संबंध विचारों से, विचारों का संबंध अच्छे और बुरे विचारों अर्थात पुण्य और पाप रूपी कर्म से होता है, कर्म का संबंध आत्मा से होता है। आत्मा का संबंध स्वर्ग, नर्क और मोक्ष से होता है। इसीलिए भोजन पानी की शुद्धता अवश्य ध्यान में रखना चाहिए। यह बात वैज्ञानिक संत आचार्य निर्भय सागर महाराज ने डेरा पहाड़ी स्थित जैन मंदिर में अपने शिष्यों से कही। भोजन सिर्फ पेट भरने के लिए या स्वाद के लिए नहीं करना चाहिए। बल्कि जीवन निर्माण और आत्मा के कल्याण के लिए करना चाहिए। जो व्यवहार स्वयं के लिए पसंद ना हो वह व्यवहार दूसरों के साथ नहीं करना चाहिए। यदि आपको कोई मारता, काटता, पीटता है तो आप भी किसी दूसरे के साथ ऐसा न करें। यदि आपको लगता है कि मेरे बेटे की कोई हत्या न करें तो आप भी ध्यान रखें कि चाहे वह पशु पक्षियों या इंसान का बेटा हो उसकी हत्या न करें। उसको मारकर न खाएं क्याेंकि क्रिया की प्रतिक्रिया जरूर होती है। यदि कोई ऐसा करता है तो दूसरा भी आपके साथ वैसा ही करेगा। इसलिए अच्छा व्यवहार करो और अच्छी भावना रखो। उन्होंने कहा बहिर्मुखी यात्रा छोड़कर अंतर्मुखी यात्रा संतों को करना चाहिए। लॉकडाउन के समय घर में रहने वाले इंसानों को भी अंतर्मुखी यात्रा करना चाहिए। ऐसा करने से इंसान भी भगवान के मार्ग पर बढ़ जाता है।  जीवन में बहुत कम समय आता है, जब मानव अंतर्मुखी यात्रा करता है। अंतर्मुखी यात्रा में अपनी आत्मा और परमात्मा से संबंध होता है, वही संबंध पाप कर्म का क्षय करके आत्मा को परमात्मा बना देता है, उसी का नाम अध्यात्म है। अंतर्मुखी यात्रा में आत्मा का आनंद और सुख प्राप्त होता है। बहिर्मुखी यात्रा से ही सारे विवाद होते है। बहिर्मुखी यात्रा वाला चाहता है कि निरोगी हो काया, घर में हो माया, कुलवंती हो नारी, पुत्र हो आज्ञाकारी, यही सुख प्राप्त होता है और इसी के लिए प्रत्येक इंसान 24 घंटे श्रम करता है। घर परिवार को छोड़कर धन संग्रह के लिए बाहर यात्रा के लिए निकलता है। सुसंस्कारवान व्यक्ति बाहर कहीं भी जाए, वह अपने उद्देश्य को नहीं भूलता। ऐसा व्यक्ति समाज, जीवन और देश का निर्माण करता है। वह अपने लक्ष्य से नहीं भटकता, सुसंस्कारों की शुरुआत माता-पिता से होती है और अंत सद्गुरु से होता है। माता-पिता के द्वारा दिए गए संस्कार मोह से युक्त जीवन निर्माण के होते है और सद्गुरु के द्वारा दिए गए संस्कार मोक्ष से युक्त आत्म कल्याण के होते हैं। मोक्ष निर्माण की पद्धति आध्यात्मिक संतों ने विकसित की है। किसी वैज्ञानिक ने नहीं टीवी चैनल, मोबाइल आदि के द्वारा बच्चे सुसंस्कारित न होकर कुसंस्कारित हो रहे हैं।  फैशन और व्यसन में फसना अपने लक्ष्य को भूल जाना ही कुसंस्कार कहलाते हैं। बच्चे सिखाने से कम दिखाने से ज्यादा सीखते हैं। मां सिखाती है और टीवी पर दिखाते हैं, इसलिए बच्चे टीवी पर दिखाए जा रहे कार्यक्रमों से ज्यादा सीख रहे हैं, वैसे ही संस्कार बच्चों में पड़ रहे हैं। अब माता-पिता का कर्तव्य बनता है कि वे अपने बच्चों के सामने आदर्श बनकर दिखाएं अपना और बच्चों का जीवन उज्जवल बनाएं।

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