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  • 131 Years Ago, 3 Gates Of Hawk Ganj Baranda Were Built In The Name Of British Officer, The Walls Were Also Occupied.

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अनदेखी:131 साल पहले अंग्रेज अफसर के नाम से बने थे हॉक गंज बरंडा के 3 गेट, दीवारों पर भी कब्जा

दमोह11 दिन पहले
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दमोह| टोपी लाइन से हॉक गंज बरंडा जाने वाले रास्ते में गेट के सामने एक व्यक्ति ने दुकान बना ली है। जिसे पांच हजार रुपए महीने में किराए पर दे दिया है। इनसेट: हाॅक गंंज बरंडा के गेट की दीवार में अतिक्रमण कर बनाई दुकान। - Dainik Bhaskar
दमोह| टोपी लाइन से हॉक गंज बरंडा जाने वाले रास्ते में गेट के सामने एक व्यक्ति ने दुकान बना ली है। जिसे पांच हजार रुपए महीने में किराए पर दे दिया है। इनसेट: हाॅक गंंज बरंडा के गेट की दीवार में अतिक्रमण कर बनाई दुकान।
  • शहर के बीचों बीच ब्रिटिश शासन में बने थे तीनों गेट, जो अब अतिक्रमण की चपेट में

शहर के बीचों बीच स्थित हॉक गंज बरंडा के तीन गेट अतिक्रमण की चपेट में आ गए हैं। दुकानदारों ने यहां पर गेट की दीवारों में अतिक्रमण करके उनके अंदर तक दुकानें बना ली हैं, जिला प्रशासन की ओर से शहर में अतिक्रमण तो हटाया गया, लेकिन इस प्राचीन धरोहर की ओर किसी अधिकारी ने ध्यान नहीं दिया। जबकि हॉक गंज बरंडा के तीनों गेट मजबूती की मिसाल हैं और इनमें प्राचीनता की झलक देखने को मिलती है।

दरअसल पुराना शहर किसी भी प्राचीन स्मारक और बनावट नगर की आत्मा होता है। यह उस शहर की उम्र बताता है और इतिहास को दर्शाता है। यही कारण है कि दमोह के पुराने शहर में बना हॉक गंज बरंडा के तीन ऐतिहासिक दरवाजे आज भी अपनी अलग पहचान बनाए हुए हैं, हालांकि इन गेटों को संवारने के लिए एक बार भी मुहिम नहीं चलाई गई, लेकिन मौका मिलने पर स्थानीय अवैध कब्जेधारियों ने कब्जा जरूर कर लिया। अब तीनों गेट अतिक्रमण की चपेट में हैं। दर्जनों अफसर बदल गए, इसके बावजूद इन दरवाजों को अपने मूल स्वरूप में लाने का काम पूरा नहीं हो पाया है। अतिक्रमण न हटने के कारण इनका जीर्णोद्धार के लिए कोई योजना नहीं बन पाई।

कब्जा किया और दुकान को किराए पर देकर 5 हजार रुपए महीना कमा रहे
दमोह के इन 3 ऐतिहासिक दरवाजों की मरम्मत कर दी जाए तो यह शहर के लिए अलग पहचान दिला सकते हैं, लेकिन जिला प्रशासन ने अतिक्रमण ही नहीं हटाया है। भास्कर ने इन प्राचीन गेटों की पड़ताल की तो तीनों अतिक्रमण से जकड़े मिले। यहां तक कि लोगों ने इनकी दीवारों में दुकानें तक बना डालीं। टोली लाइन से बरंडा जाने वाले गेट पर एक दुकानदार ने कब्जा कर लिया है और दुकान को किराए पर देकर 5 हजार रुपए महीना कमा रहा है।

इसी तरह बर्तन बाजार की ओर जाने वाले गेट पर एक दुकानदार ने कियोस्क सेंटर खोल लिया है। गेट के बाजू में ही शटर लगा डाली है। इसी तरह गांधी चौक के पास से हॉक गंज बरंडा जाने वाले रास्ते के गेट पर एक दुकानदार ने मोबाइल रिचार्ज की दुकान खोली ली है। सालों से दुकानदार का कब्जा है और जिला प्रशासन की ओर से उसे हटाया नहीं गया। एक बार भी नगरपालिका और जिला प्रशासन ने नोटिस तक जारी नहीं किया। इस संबंध में तहसीलदार बबीता राठौर का कहना है कि जो भी अतिक्रमण है, उसे नगरपालिका से मिलकर हटाया जाएगा।

इन गेटों को केवल पत्थरों से बनाया गया था
दमोह गजेटियर 1904 रसल के अनुसार अंग्रेजी सरकार के तत्कालीन चीफ कमिश्नर सीएचटी क्रासवटे ने 10 जनवरी 1885 को दमोह में कैंप लगाया था। इतिहासकार व वरिष्ठ अधिवक्ता विनोद श्रीवास्तव ने बताया कि दमोह में नपा टाउन हाल के निर्माण के दौरान ही हॉकगंज बरंडा का निर्माण भी हुआ था। जिसका नाम तत्कालीन डिप्टी कमिश्नर हॉक के कारण पड़ा। उन्होंने बताया कि दमोह में ब्रिटिश काल में जिला न्यायालय भवन, सर्किट हाऊस, हॉकगंज बरंडा बना था, जाे एक सदी बीतने के बावजूद भी आज भी जस की तस हालत में खड़े हैं। इन्हें केवल पत्थरों से बनाया गया है। जिन्हें विशेष प्रकार के मसाले से खड़ा किया गया। यही प्राचीन इमारतें आज हमारी धरोहर के रूप में जानी जाती हैं।

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