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कार्रवाई:फर्जी पट्‌टे बनाने की शिकायतें दो बार अफसरों तक पहुंचीं, लेकिन नहीं हुई कार्रवाई

दमोह8 महीने पहले
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कोतवाली पुलिस ने आदिवासियों को फर्जी पट्‌टा बनाकर बेचने के मामले में पकड़े गए आरोपी को जेल भेज दिया है। आरोपी से सील और दस्तावेज भी जब्त किए गए हैं। जिनका उपयोग करके वह फर्जी पट्‌टा बनाता था। पड़ताल में यह बात सामने आई कि इससे पहले भी आरोपी ने फर्जी पट्‌टा बनाकर आदिवासियों को बेचे थे, इसकी शिकायत भी अधिकारियों तक की गई थी, लेकिन अधिकारियों ने इस मामले में गंभीरता नहीं दिखाई और फर्जीवाड़ा करने वाले आरोपी के हौसले बंद हो गए और उसने 100 से ज्यादा आदिवासियों को फर्जी पट्‌टा बनाकर बेच डाले।

आरोपी ने सिंग्रामपुर, आमघाट और सगोड़ी में बेचे थे फर्जी अिधकार पट्‌टा

यहां बता दें कि पुरानी कलेक्टोरेट परिसर में स्टाम्प बेचने वाले किशोर दुबे को कोतवाली पुलिस ने चार दिन पहले फर्जी पट्‌टा बेचने की शिकायत पर पकड़ा था। आदिम जाति कल्याण विभाग की जिला संयोजक रेखा पांचाल के प्रतिवेदन पर पुलिस ने यह कार्रवाई की थी। पूछताछ के दौरान यह बात सामने आई थी कि आरोपी ने सिंग्रामपुर, आमघाट और सगोड़ी खुर्द में आदिवासियों को फर्जी वन अधिकार के पट्‌टा बनाकर 5-5 हजार रुपए में बेचे थे। पड़ताल के दौरान 100 पट्‌टे बेचने की बात सामने आई। जिसमें 77 पट्‌टे बरामद हो गए थे। आदिवासियों को पट्‌टे देने के एवज में 5-5 हजार रुपए की राशि वसूली गई थी। कोतवाली टीआई एचआर पांडे ने बताया कि आरोपी से नकली पट्‌टों के साथ-साथ सील और फर्जीवाड़ा करने वाले दस्तावेज जब्त किए गए हैं। उसे जेल भेज दिया गया है।

लंबे समय से चल रहा फर्जीवाड़ा: वर्ष 2013 और 2016 में आदिवासियों ने फर्जी पट्‌टे मिलने की शिकायत की थी

आरोपी की ओर से फर्जी पट्‌टा बनाकर बेचने का काम लंबे समय से किया जा रहा है। आरोपी पट्‌टा बनाकर आदिवासियाें को सौंप देता था। जब भी वन विभाग की टीम मौके पर कार्रवाई करने के लिए जाती थी तो उन्हें आदिवासी पट्‌टा दिखाते थे, जिस पर कार्रवाई रोक दी जाती थी। पट्‌टा असली है या नकली है। इसके बारे में वन विभाग के अधिकारी भी पता नहीं कर पाते थे, क्योंकि मौके पर उनके पास ऐसा कोई दस्तावेज नहीं होता था, जिससे पट्‌टे का मिलान कर सकें। आदिम जाति कल्याण विभाग की जिला संयोजक रेखा पांचाल ने बताया कि आरोपी किशोर दुबे के खिलाफ पहले भी शिकायत दर्ज कराई गई थी।

वर्ष 2013 और 2016 में शिकायत दर्ज हुई थी, लेकिन तत्कालीन अधिकारियों ने इस मामले को गंभीरता से नहीं लिया। यदि तभी कार्रवाई हो जाती तो, इतनी बढ़ी संख्या में फर्जी पट्‌टे बनकर तैयार नहीं होते और आदिवासियों को ठगा नहीं जाता। उन्होंने बताया कि अब तक जितने भी आदिवासियों के पट्‌टे जारी हुए हैं। उनका मिलान किया जाना जरुरी हो गया है।

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