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बयान:पुरुषार्थ खेती है, सफलता उसकी फसल है, आनंद उसका फल है : निर्भय सागर

दमोहएक महीने पहले
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  • संत आचार्य श्री निर्भय सागर महाराज ने जैन धर्मशाला में दिये उपदेश

वैज्ञानिक संत आचार्य श्री निर्भय सागर महाराज ने जैन धर्मशाला में कहा जिसका आचार, विचार, व्यवहार और वाणी सुंदर है वह दुनिया में सबसे सुंदर है, भले ही शरीर कुरूप क्यो न हो। स्वरूप को देखने वाले रूप को नहीं देखते हैं। वे अकेले में बैठकर निजी से संबंध बनाते हैं। खुद से संबंध बनाने वाले खुद ही खुदा बन जाते हैं। वे स्वस्थ सुखी हो जाते है। दूसरों से संबंध बनाने पर एक न एक दिन सबसे जुदा हो जाते हैं। जुदा होने पर हर प्राणी दुखी होता हैं इसलिए दूसरों से नहीं बल्कि खुद और खुदा से संबंध बनाना सुखी बनने का सर्वश्रेष्ठ उपाय है। संबंध के बिना मानव जीवन अधूरा है, इसीलिए हर मानव संबंध बनाता है। मानव का संबंध मानव के साथ-साथ प्रत्येक प्राणी और प्रकृति से भी होता है। जो प्रत्येक प्राणी और प्रकृति से मधुर संबंध बनाकर रहता है वह मानव नहीं महामानव है। संबंध बनाए बिना जिंदगी जीना पशु तुल्य है। संबंध के बिना मानव मायूस बना रहता है। मानव यदि विवेक बुद्धि से हीन होकर एवं अति मोह से युक्त होकर संबंध स्थापित करता है तो अपने स्वभाव, कर्तव्य और हित को भूल कर अपराध के मार्ग पर चला जाता है।

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