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कोरोना ने किया प्रहार:बांसातारखेड़ा में 10 साल पहले टीबी से पिता की मौत, अब कोरोना ने मां को छीना, 75 साल की दादी बेसहारा चार बच्चों का सहारा

दमोहएक महीने पहलेलेखक: संजय मौर्य
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दमाेह। मां पिता को खोने के बाद दादी के साथ रहते हैं चारों बच्चे। - Dainik Bhaskar
दमाेह। मां पिता को खोने के बाद दादी के साथ रहते हैं चारों बच्चे।

10 साल पहले टीबी की बीमारी ने पिता को छीन लिया। जैसे-तैसे दादी और मां बीड़ी बनाकर परिवार का भरण-पोषण कर रहे थे कि 12 मई को कोरोना महामारी ने मां को भी छीन लिया। ऐसे में अब तीन बहनें और एक भाई अनाथ हो गया है। घर में सिर्फ एक 75 साल की बूढ़ी दादी हैं। जिनके कंधों पर चारों बच्चों का भार आ गया है। घर में न गरीबी रेखा का राशन मिलता है और न ही पेंशन।
हालात ये हैं कि बच्चों का पेट भरने के लिए दिन भर में दादी 50 रुपए की बीड़ी बना पाती हैं और उससे आटा खरीदकर लाती हैं। तब जाकर घर में चूल्हा जलता है। मुसीबतों से जूझ रहे इस परिवार को सिस्टम ने काफी दुख दिए। पहले इन बच्चों की मां राशन कार्ड बनवाने के लिए भटकती रहीं। 4 हजार रुपए रिश्वत देने के बाद गरीबी रेखा का कार्ड बना। लेकिन 6 माह भी राशन नहीं मिल पाया और बंद हो गया। पिछले एक साल से राशन के लिए यह परिवार भटक रहा था। लेकिन निराशा ही हाथ लगी।
बड़ी बहन शिक्षिका बनना चाहती है लेकिन तंगी ने लगा दिया पढ़ाई पर ब्रेक
दरअसल यह कहानी सागर-दमोह मार्ग पर स्थित ग्राम बांसा तारखेड़ा में सरस्वती शिशु मंदिर स्कूल के पास रहने वाली दीप्ति, दीपाली, कल्पना और निशांत राजपाल की है। माता-पिता का निधन होने के बाद यह तीनों बहनें और एक भाई बेसहारा हो गए हैं। परिवार में केवल 75 साल की दादी गुलाबरानी ही पालक हैं। उनका कहना है कि उनकी एक मात्र संतान देवेंद्र था।

10 साल पहले उसकी बीमारी से मौत हो गई। बहू और बच्चों के सहारे जीवन यापन कर रहे थे। लेकिन कोरोना से बहू भी चल बसी। ऐसे में अब पूरा परिवार उजड़ गया है। वे कहती हैं कि बड़ी नातिन दीप्ति 10वीं पढ़ती है और आगे चलकर शिक्षिका बनना चाहती है। लेकिन ऐसे हालात में कुछ बोल नहीं पा रही है। मंजली नातिन दीपाली 9वीं की पढ़ाई आगे जारी रखना चाहती है। कुछ इसी तरह की कहानी छोटी नातिन कल्पना और नाती निशांत की है।

देवेंद्र ही चलाता था परिवार, अब दादी 50 रुपए की बीड़ी बनाती हैं तब जलता है घर में चूल्हा

गुलाबरानी की एक मात्र संतान देवेंद्र था। टीबी की बीमारी के चलते वर्ष 2011 में उसका निधन हो गया। ऐसे में गुलाब रानी और देवेंद्र की पत्नी सावित्री मिलकर बीड़ी बनाते थे। दो से ढाई सौ रुपए की बीड़ी बनाकर परिवार चलाते थे। लेकिन सावित्री का कोरोना से निधन होने की वजह से सास गुलाबरानी परिवार में अकेली बची हैं।

75 साल की गुलाबरानी कहती हैं कि अब बीड़ी बनाने का काम नहीं होता। इसलिए वे दिन भर में 50 से 60 रुपए की बीड़ी बना पाती हैं। इसी से वे आटा, चावल लाकर तीन नातिन और एक नाती का भरण-पोषण करती हैं।

राशन के लिए सरपंच, सचिव के चक्कर लगाए
गुलाबरानी कहती हैं कि वे अब एक-एक रुपए को लेकर परेशान हैं। सरकार से कोई मदद नहीं मिल रही है। पहले गरीबी रेखा का कार्ड बनवाया। लेकिन वह अब काम नहीं आ रहा। सरपंच और सचिव के चक्कर लगाने के बाद भी राशन मिलने की उम्मीद टूट गई। बहू ने गरीबी रेखा का राशन कार्ड बनवाने के लिए गांव के अरुण बानिया को चार हजार रुपए दिए थे। कार्ड भी बन गया था। लेकिन बाद में राशन मिलना बंद हो गया।

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