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प्रवचन:दूसरों के लिए अपने सुखों को छोड़ना ही सबसे बड़ा तप है

सागरएक महीने पहले
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  • इच्छा के विरुद्ध कार्य को तप कहा जाता है
  • महावीर दिगंबर जैन मंदिर नेहानगर में ऐलकश्री ने कहा-

जीवन का रास्ता तप के नगर से गुजरता है। इच्छा के विरुद्ध कार्य को तप कहा जाता है। हर आदमी की अनियंत्रित इच्छाएं होती हैं, उन इच्छाओं को नियंत्रित कर लेना सबसे बड़ी तपस्या होती है। अपनी संतान से, अपने वैभव से, अपने भोगों से, धर्म के द्वारा इन सबकी लालसाओं, इच्छाओं को रोक देने का काम सबसे बड़ा तप होता है। यह बात महावीर दिगंबर जैन मंदिर नेहानगर में विराजमान ऐलकश्री सिद्धांतसागर महाराज ने कही। उन्होंने कहा कि अभी हम देश की सबसे बड़ी विभूतियों के बारे में बात सोचते हैं चाहे वह श्री कृष्ण हों, चाहे महावीर हो, चाहे वह भगवान राम हो ,कोई भी हो इन सबके जीवन की एक सबसे बड़ी तपस्या होती है। वह तपस्या यह है कि सबसे पहले उन्होंने अपने सुख को छोड़ा और सिर्फ दूसरों के सुख के लिए। जब व्यक्ति दूसरे की सुविधाओं और सुख के लिए अपनी सुविधाओं का त्याग कर देता है तो वह व्यक्ति लोकप्रिय बन जाता है। वह महान बन जाता है। जब व्यक्ति अपनी सुविधा, अपने सुख के लिए हाहाकार मचा देता है तो वह सबसे ज्यादा गिरा हुआ इंसान बन जाता है।

अगर किसी को महान बनना है और तप करना है तो अपने बच्चों, बीबी, परिवार, लौकिक ख्याति विस्तार के लिए नहीं बल्कि दूसरों के लिए करना चाहिए। सच्चे तपस्वी वे होते हैं जो तपस्या करते हैं सिर्फ दूसरो के लिए या अपनी आत्मा के लिए, अपने स्वयं के लिए। भगवान राम ने 14 वर्ष का वनवास अगर लिया तो सिर्फ इसलिए कि पिता के वचनों का पालन हो। पिता के वचनों के पालन के लिए उन्होंने अपनी सारी की सारी सुविधाएं और सुख को छोड़ दिया। इसी तरह से श्रीकृष्णजी ने अपनी सारी की सारी सुविधाओं को छोड़कर के एकमात्र जीवन को श्रेष्ठ बनाने, उच्च स्थान प्रदान करने के लिए उन्होंने तपस्या की और उनके उपदेश आज भी प्रासंगिक बन गए।

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