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विश्व दिव्यांग दिवस पर विशेष:आज पढ़िए तीन सच्ची बुंदेली कहानी, जिन्हें परिवार से ताकत मिली तो शारीरिक लाचारी को हरा दिया

सागरएक महीने पहलेलेखक: संदीप तिवारी
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आज हम आपको ऐसे तीन लोगों की कहानी से रुबरु कराने जा रहें जिन्होंने अपने जज्बे और उनके अपनों से मिला साथ ने उनके इस लाचारी को एक हिम्मत दी और उन्हें इस दुनिया के साथ मिलकर चलना सिखाया। पहली कहानी एक दृष्टिहीन शिक्षक की है जो देख नहीं सकते पर क्लास में अनुशासन के लिए विद्यार्थियों पर उनकी पत्नी नजर रखती है, दूसरी कहानी एक छात्रा की है जो पैरों से लिखकर अपनी क्लास में प्रथम आती है, इस छात्रा के दोनों हाथ नहीं हैं लेकिन जुनून ऐसा कि रोज 160 किमी का सफर कर एम.ए कर रहीं हैं और तीसरी कहानी एक ऐसी बच्ची की है जो नौ साल घसीटकर चली पर मां की ममता की ताकत के आगे प्रकृत को भी झुकना पड़ा, बच्ची को पुनर्वास केंद्र में मां ने 3 साल तक एक्सरसाइज कराई तो आज वो अपने पैरों पर खड़े होने के काबिल हो गई।

पति देख नहीं सकते, क्लास में अनुशासन के लिए विद्यार्थियों पर नजर रखती है पत्नी

सागर से संदीप तिवारी की रिपोर्ट

क्लास में शिक्षक और उनके साथ पत्नी।
क्लास में शिक्षक और उनके साथ पत्नी।

सागर के डॉ. हरीसिंह गौर केंद्रीय विवि परिसर में स्थित केंद्रीय विद्यालय के दृष्टिहीन शिक्षक कोमल लोधी की आंखें उनकी पत्नी सोनल है। सोनल खुद दिव्यांग है लेकिन 22 माह की बेटी को घर छोड़ रोज पति के साथ स्कूल जा रही है। जब कोमल क्लास में सामाजिक विज्ञान पढ़ाते हैं तो सोनल वहीं खड़ी रहकर विद्यार्थियों पर नजर रखने और पढ़ाने में उनकी मदद करती है, ताकि क्लास में अनुशासन बना रहे।

कोमल और सोनल की मुलाकात छत्तीसगढ़ के दिव्यांग सेवा सदन के माध्यम से हुई। दोनों एक-दूसरे को दिल दे बैठे। 26 फरवरी 2019 को शादी की और सवा 6 माह बाद 5 सितंबर 2019 को केंद्रीय विद्यालय में कोमल का जॉब लग गया। तभी से सोनल पति की आंखें बनकर उनके साथ स्कूल जाने लगी।

इस बीच 24 जनवरी 2020 को बेटी को जन्म दिया तो 4 माह पति के साथ स्कूल नहीं जा सकी। 23 अक्टूबर 2021 को कोमल का ट्रांसफर बेंगलुरु केवी से सागर केवी हो गया। कोमल गुना के बटावदा के है। भोपाल से बीए-बीएड व सागर विवि से एमए किया है।

दोनों हाथ नहीं लेकिन जुनून ऐसा कि रोज 160 किमी का सफर कर एमए कर रहीं

तेंदूखेड़ा से श्याम सुंदर जैन की रिपोर्ट

कॉपी में पैर से लिखती दिव्यांग छात्रा दुर्गा।
कॉपी में पैर से लिखती दिव्यांग छात्रा दुर्गा।

ये हैं दुर्गा लोधी। उम्र 21 साल। दोनों हाथ नहीं है फिर भी अपनी किस्मत बनाने के लिए पैरों से लिख रही है। दुर्गा ने 10वीं 61%, 12वीं 55% और बीए 62% से पास की। तारादेही के बम्हौरी माल की इस बेटी में पढ़ाई का ऐसा जुनून है कि अब 160 किमी का सफर रोज तय कर दमोह पीजी कॉलेज जाती है, ताकि राजनीति विज्ञान से एमए कर सके। इसके बाद बीएड, एमएड करने की ठानी है।

हालांकि परिवार की स्थिति कमजोर है। दुर्गा को दो साल पहले कृत्रिम हाथ लगे लेकिन इनसे उसे लिखने में मदद नहीं मिली। इसलिए पैरों से लिखना जारी रहा। वह पैरों से मोबाइल भी चला लेती है। दुर्गा ने बताया दमोह पीजी कॉलेज में हॉस्टल नहीं मिला। इसलिए बस से अपडाउन करना करना पड़ रहा है।

नौ साल घसीटकर चली, पुनर्वास केंद्र में मां ने 3 साल एक्सरसाइज कराई तो खड़ी हो गई

टीकमगढ़ से रवि ताम्रकार की रिपोर्ट

पुनर्वास केंद्र में मुस्कान को एक्सरसाइज कराती मां शारदा और डॉक्टर।
पुनर्वास केंद्र में मुस्कान को एक्सरसाइज कराती मां शारदा और डॉक्टर।

12 साल पहले परिवार की पहली बेटी दोनों हाथ-पैर से दिव्यांग पैदा हुई। माता-पिता को उम्मीद नहीं थी कि यह कभी पैरों पर खड़ी हो पाएगी। बेटी मुस्कान भी नौ साल तक घसीटकर चलती रही। फिर मां शारदा अहिरवार को पुनर्वास केंद्र के बारे में पता चला। पिता मुकेश अहिरवार मजदूरी करने गांव लक्ष्मपुरा से टीकमगढ़ आते थे तो मां शारदा बेटी मुस्कान को लेकर उनके साथ केंद्र जाने लगी। यहां एक्सरसाइज कराई।

यह क्रम 3 साल से चल रहा है। अब मुस्कान पैरों पर खड़ी होने लगी है। वह मां की मदद से चल लेती है। पुनर्वास केंद्र के डॉ.अभिषेक बुंदेला ने बताया दिव्यांगता की 5 कैटेगरी है। जिसे ग्राॅस मोटर फंक्शन कैटेगरी सिस्टम (जीएमएफसीएस) कहा जाता है।

मुस्कान जब आई थी तो 5वीं कैटेगरी पर थी, अब तीसरी में आ गई। आगे भी यह थैरेपी चलती रही तो मुस्कान ठीक हो सकती है। मां शारदा ने बताया लॉकडाउन में केंद्र जाना बंद हो गया तो बेटी फिर घसीटकर चलने लगी। डॉ.बुंदेला ने ऑनलाइन थैरेपी से ठीक किया।

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