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इस गांव से हमें सीखने की जरूरत:बेटियों को प्रोत्साहित करने पेड़ों व दीवारों पर उकेरे नाम, इसलिए हरपुरा मड़िया कहलाता है बेटियों का गांव

टीकमगढ़एक महीने पहलेलेखक: सुमित कुमार चौबे/रवि ताम्रकार
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पेड़ पर लिखे लिखे गांव की बच्चियों के नाम। - Dainik Bhaskar
पेड़ पर लिखे लिखे गांव की बच्चियों के नाम।
  • 1000 पुरुषों पर 1107 महिलाएं; पहला गांव जहां महिला ज्यादा, कोई घर नहीं जहां बेटी न हो

टीकमगढ़ जिले का एक ऐसा गांव जो सिर्फ बेटियों के नाम से जाना जाता है। यह गांव जिला मुख्यालय से महज 10 किमी की दूरी पर है। हरपुरा मड़ियां गांव के बुजुर्ग हों या बच्चियों के माता-पिता उन्हें प्रोत्साहित कर आगे बढ़ने की सीख देते हैं।

बेटी-बचाओ बेटी पढ़ाओ स्लोगन इसी गांव में चरितार्थ होता है। यहां बेटियों को प्रोत्साहित करने के लिए पेड़ों और घरों के दीवारों पर बेटियों के नाम उकेरे गए हैं। यहीं कारण है कि इस गांव का लिंगानुपात 1 हजार पुरुषों पर 1107 महिलाएं हैं। गांव में बेटों की चाह में बेटियां हुई, लेकिन कभी भ्रूण लिंग परीक्षण और भ्रण हत्या की नौबत बुजुर्गों ने नहीं बनने दी।

नतीजा आज इस गांव ने बेटियों के गांव के नाम से पहचान बनाई। गांव के हर घर में बेटा न हो, लेकिन बेटियां जरूरी मिलेंगी। बुजुर्गाें ने सिखाया कि बेटियां घर की लक्ष्मी होती हैं, बुजुर्गों की इसी सीख ने यहां के लोगों की मानसिकता बदल दी। गांव में बेटी हो या बेटा दोनों के जन्म पर खुशियां मनाई जाती हैं।

हरपुरा मड़िया गांव में बच्चियों ने बुजुर्ग महिलाओं के सम्मान में होली खेली।
हरपुरा मड़िया गांव में बच्चियों ने बुजुर्ग महिलाओं के सम्मान में होली खेली।

कुछ कमियां जिन्हें पूरा करने की जरूरत

  • घर में शौचालय बने, जिससे बेटियों को खुले में शौच न जाना पड़े।
  • हाईस्कूल दूर होने से स्कूल जाने में असुविधा।
  • स्वारोजगार से जोड़ने के लिए प्रशिक्षण केंद्र बनाएं।

प्रदेश से कहीं ज्यादा इस गांव का लिंगानुपात
टीकमगढ़ जिले में एक हजार पुरुषों पर 901 महिलाएं हैं। प्रदेश में 1 हजार पुरुषों पर 948 महिलाएं हैं, लेकिन हरपुरा गांव में 1 हजार पुरुषों पर 1107 महिलाएं है। गांव की आबादी 2107 है। होली हो या दीवाली गांव की बुजुर्ग महिलाएं बेटियों के साथ मिलकर खुशियां मनाती हैं।

इन महिलाओं के प्रयास लाए रंग

गांव की गुलाब रानी, जराव बाई लोधी, श्रीबाई गांव के लोगों के लिए हमेशा ही बेटियों को प्रोत्साहित करने के लिए कहती है। उनका मानना है कि बेटियां ही समाज को आगे बढ़ाती हैं।

85 साल की जरावबाई लोधी कहती है, कि बेटियां एक घर नहीं दो घरों को जोड़ने का काम करती हैं। उनके ऊपर दो घरों की मान-मर्यादा को बनाए रखने की जिम्मेदारी होती है। इसलिए बेटियां उन्हें घरों में जन्म लेती हैं जो सौभाग्यशाली होते हैं। 80 साल की गुलाबरानी अक्सर गांव के लोगों से कहती हैं कि घर में बेटा हो या बेटी, कभी बेटी को बोझ नहीं समझें।

घर की दीवार पर लिखे बच्चियों के नाम।
घर की दीवार पर लिखे बच्चियों के नाम।

गांव में महिला ज्ञानालय बनाया गया
बेटियों और महिलाओं को शिक्षा के प्रति सजग रहने के यहां लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। जिसके चलते गांव में ज्ञानालय भी खोला गया। यहां पर गांव की इंद्र कुमारी लोधी और रजनी विश्वकर्मा सहित चार बेटियां गांव की महिलाओं को शिक्षित बनाने का काम करती हैं। जिससे हरपुरा गांव में महिलाओं की साक्षरता 85% से अधिक है।

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