गलत तरीके से लड़ रहे चुनाव:निर्वाचन आयोग को मिली शिकायत के बाद बागरी समाज पर जांच की तलवार

सतना23 दिन पहले
  • कॉपी लिंक

सतना में अनुसूचित जाति यानी एससी के रूप में अब तक राजनैतिक सहभागिता एवं अन्य लाभ प्राप्त करते आए विंध्य के बागरी समाज को बड़ा झटका लग सकता है। रैगांव से टिकट की दावेदारी के लिए घर के कलह से पनपा यह मुद्दा अब पूरे बागरी समाज के लिए बड़ी परेशानी और बड़े नुकसान का सबब बन सकता है।

निर्वाचन आयोग को मिली एक शिकायत के बाद बागरी समाज पर जांच की तलवार लटकने लगी है। इस मामले में कलेक्टर एवं जिला निर्वाचन अधिकारी से प्रतिवेदन मांगा गया है।

बता दें कि रैगांव उप चुनाव में टिकट की दावेदारी को लेकर बागरी परिवार में ही जंग छिड़ गई थी। दिवंगत विधायक की छोटी पुत्रवधु वंदना देवराज बागरी के प्रमाण-पत्र पर सवाल उठे थे और उनका प्रमाण-पत्र निरस्त कर दिया गया था। हालांकि बाद में वो हाईकोर्ट से स्थगन ले आई थीं। उनका मामला थोड़ा जुदा इसलिए था क्योंकि उनके पिता की जाति को सिवनी में एससी में नहीं माना गया था, लेकिन अब अन्य बागरियों के जाति प्रमाण-पत्रों पर भी सवाल उठ खड़े हुए हैं।

मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी मध्यप्रदेश को एक शिकायत मिली है, जिसमे तथ्यों के साथ बागरी समाज के एससी वर्ग में होने पर सवाल उठाए गए हैं। साथ ही इन्हीं प्रमाण-पत्रों के आधार पर भाजपा प्रत्याशी प्रतिमा बागरी और सपा समर्थित प्रत्याशी धीरेन्द्र सिंह धीरू के चुनाव लड़ने पर भी सवालिया निशान लगाए गए हैं। इस शिकायत के बाद सामान्य प्रशासन विभाग ने जांच शुरू कर दी है।

शिकायत में आदिम जाति एवं अनुसूचित जाति कल्याण विभाग के 2003 के पत्र का हवाला देते हुए बताया गया कि मध्यप्रदेश के महाकौशल, बुंदेलखण्ड व विन्ध्य प्रदेश क्षेत्रों में सामान्यत: बागरी कहलाने वाले व्यक्ति अनुसूचित जाति में सम्मिलित होने की पात्रता नहीं रखते हैं। सामान्य प्रशासन विभाग ने कलेक्टर एवं जिला निर्वाचन अधिकारी से इस संबंध में प्रतिवेदन मांगा है।

गलत तरीके से प्रमाण-पत्र प्राप्त कर लड़ा चुनाव

रैगांव उपचुनाव के मद्देनजर अखिल भारत अनुसूचित जाति परिषद ने चुनाव आयोग को तथ्यगत शिकायत भेजी है। जिसमें कहा गया है कि प्रतिमा बागरी, धीरेन्द्र सिंह धीरू सहित अन्य ने अनुसूचित जाति की श्रेणी से नामांकन दाखिल किया है। जबकि ये लोग अनुसूचित जाति की श्रेणी में नहीं आते हैं। इनका नामांकन निरस्त करने की मांग करते हुए बताया गया है कि बागरी और बागड़ी 1977 की सूची क्रमांक 2 के अनुसार अनुसूचित जाति के रूप मान्य थी।

2007 में इसे संशोधित कर दिया गया और विन्ध्यप्रदेश में रहने वाले बागरी-बागड़ी को अनुसूचित जाति की श्रेणी से हटा दिया गया है। 2007 के गजट नोटिफिकेशन के अनुसार अनुसूचित जाति की सूची क्रमांक 2 पर अनुसूचित जाति के रूप में उल्लेखित की गई है। इसलिए विन्ध्यप्रदेश के जिला सतना में रहने वाले प्रतिमा बागरी, धीरेन्द्र सिंह धीरू व अन्य ने गलत तरीके से अनुसूचित जाति का प्रमाण-पत्र प्राप्त किया है। लिहाजा इन्हें चुनाव लड़ने की पात्रता नहीं हैं।

शिकायत में आदिम जाति एवं अनुसूचित जाति कल्याण विभाग मंत्रालय के 14 जुलाई 2003 के उस पत्र का हवाला दिया गया है, जो तत्कालीन प्रमुख सचिव डॉ. भागीरथ प्रसाद ने सभी संभागायुक्त, सभी कलेक्टर और सभी विभागाध्यक्षों को जारी किया था।

इसमें स्पष्ट कहा गया है कि मप्र आदिम जाति अनुसंधान तथा प्रशिक्षण संस्थान द्वारा पाया गया है कि प्रदेश के पूर्व मध्य भारत क्षेत्र में सम्मिलित जिलों में निवास करने वाले बागरी-बागड़ी समाज के व्यक्ति अनुसूचित जाति में रखे जाने की पात्रता रखते हैं। प्रदेश के अन्य क्षेत्रों जैसे महाकौशल, बुंदेलखंड, विन्ध्यप्रदेश क्षेत्रों में सामान्यत: बागरी कहलाने वाले व्यक्ति अनुसूचित जाति में सम्मिलित होने की पात्रता नहीं रखते हैं।

जीएडी ने तलब किया प्रतिवेदन

निर्वाचन आयोग से प्राप्त हुई इस शिकायत को सामान्य प्रशासन विभाग ने गंभीरता से लिया है। विभाग ने कलेक्टर एवं जिला निर्वाचन अधिकारी से इस मामले की जांच कर विस्तृत प्रतिवेदन चाहा है।

सतना कलेक्टर अजय कटेसरिया ने बताया कि जिले में पिछले कई सालों से बागरी जाति को अनुसूचित जाति के जाति प्रमाण-पत्र जारी किए जा रहे हैं। इस संबंध में जो भी निर्णय लेना है। वो सामान्य प्रशासन समिति की छानबीन समिति को लेना है। विभाग ने प्रतिवेदन मांगा है, वह समय-सीमा में प्रेषित कर दिया जाएगा।

खबरें और भी हैं...