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  • Like The Sweets Of Diwali, This Village Is Made From Holi To Rangpanchami So That The Discrimination Can Be Overcome.

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अनूठी परंपरा:दिवाली की मिठाइयों की तरह इस गांव में होली से रंगपंचमी तक बनाई जाती है सेंव ताकि दूर हो सके भेदभाव

मड़ावदा/नागदाएक महीने पहले
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  • छुआछूत को दूर करने के लिए शुरू की गई थी परंपरा, सद्भाव के साथ रिश्तेदारों और परिचितों को होता है वितरण

नागदा से करीब 20 किलोमीटर दूर स्थित ग्राम मड़ावदा में होली और रंगपंचमी का पर्व भी दीपावली से कम नहीं है। जिस तरह दिवाली पर घरों में मिठाइयां बनाई जाती है, उसी तरह होली से रंगपंचमी तक यहां सेंव बनाने की अनूठी परंपरा है।

पूरे गांव में अलग-अलग स्थानों पर भटि्टयां लगाकर कारीगर सेंव बनाते हैं। खास बात यह है कि इस परंपरा की शुरुआत आपसी सद्भाव बनाए रखने, छुआछूत को दूर करने और भेदभाव मिटाने के उद्देश्य से की गई थी। उसके बाद गांव के लोगों ने इस परंपरा को अपने पर्व का हिस्सा बना लिया। 80 से भी अधिक साल से यह अनूठी परंपरा गांव में बनी हुई है।

ग्राम मड़ावदा की आबादी लगभग 5 हजार है और यहां करीब 1200 घर हैं। होली के एक दिन बाद यहां हाटकेश्वर महादेव मंदिर पर दो दिन का मेला लगता है। जिसमें सेंव खास तौर पर बनाई जाती है। हालांकि इस बार कोरोना के बढ़ते प्रभाव के चलते मेला निरस्त हो चुका है लेकिन यह परंपरा आज जारी है।

होली के तीन दिन पहले से लेकर रंगपंचमी तक गांव के हर परिवार द्वारा सेंव बनवाई जाती है। गांव में अलग-अलग जगह बड़ी 8-10 भटि्टयां लगाकर सेंव तैयार करवाई जाती है। हर परिवार द्वारा इन कारीगरों को सेंव बनाने का ऑर्डर दिया जाता है।

इस सेंव को लोग अपने घरों में खाने के अलावा परिचितों और रिश्तेदारों को भी वितरित करते हैं। ताकि आपस में भेदभाव न रहे और सद्भाव बना रहे। मड़ावदा से जुड़े आसपास के गांव के लोग भी यहां सेंव बनवाने आते हैं। इस वर्ष गांव में 7 भटि्टयां लगाई गई हैं, जिन पर 50 से अधिक कारीगर पिछले दो दिनों से सेंव बनाने का काम कर रहे हैं।

प्रत्येक परिवार से कम से कम 5 किलो का ऑर्डर
सेंव बनवाने की इस परंपरा में गांव का हर परिवार हिस्सा लेता है। प्रत्येक परिवार से कम से कम 5 किलोग्राम सेंव का ऑर्डर दिया जाता है। कई बड़े परिवार ऐसे भी हैं जो 10 से 15 किलोग्राम तक सेंव बनवाते हैं। यानी औसतन 6 हजार किलोग्राम सेंव इन पांच-सात दिनों में यहां तैयार की जाती है। खास बात यह है सेंव बनाने वाले उस्ताद व कारीगर ग्रामीणों से केवल बेसन व मसाला लेते हैं। तेल व मजदूरी कारीगरों की होती है। 5 किलोग्राम सेंव के लिए औसतन 650 रुपए की मजदूरी ली जाती है।

छुआछूत दूर करने के लिए परंपरा शुरू
गांव के 92 वर्षीय बुजुर्ग आनंदीलाल शर्मा बताते हैं कि इस अनूठी परंपरा की शुरुआत छुआछूत और भेदभाव को दूर करने के लिए हुई थी। तब मेला लगने पर लोग यहां जात-पात और छुआछूत के कारण दुकानों से सेंव नहीं लेते, न ही खाते थे। इसलिए प्रत्येक घर में सेंव बनाने और अपने परिचितों व रिश्तेदारों को वितरित करने की इस परंपरा की शुरुआत लगभग 80 साल पहले की गई थी।

तीस साल से बना रहे ग्रामीणों के लिए सेंव
मड़ावदा के ही उस्ताद संजयदास बैरागी बताते हैं वह 30 साल से गांव में सेंव बनाने का काम करते हैं। धीरे-धीरे इस गांव में सेंव बनाने की परंपरा की जानकारी अन्य गांव व नगर के लोगों को भी लगती गई। जिससे अन्य स्थानों से भी अब कारीगर यहां आकर भटि्टयां लगाते हैं और ऑर्डर लेकर सेंव बनाते हैं।

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