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लॉकडाउन में या अनलॉक:घरों से निकल रहे कचरे में 15 फीसदी ज्यादा निकल रही पॉलीथिन

उज्जैन6 महीने पहले
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  • हमारे घरों से रोज निकल रहा 180 से 200 टन कचरा, खाद बनाने में हो रही देरी, पशुओं के लिए भी खतरनाक

हम घरों में रहें या बाहर। लॉकडाउन में या अनलॉक। हमारी पॉलीथिन उपयोग करने की आदत में ज्यादा बदलाव नहीं आया है। नगर निगम अफसरों के अनुसार शहर के घरों से रोज 180 से 200 टन औसत कचरा निकल रहा है। इसमें 30 फीसदी पॉलीथिन यानी 54 से 60 टन पॉलीथिन हाेती है। लॉकडाउन के पहले 20 मार्च को शहर से 210 टन कचरा निकला था। तब हमारे घरों से 15 फीसदी पॉलीथिन कचरा फेंका गया था। लॉकडाउन के दौरान इसकी मात्रा कम हुई लेकिन शहर के अनलॉक होने यानी 1 जून से 14 जुलाई तक घरों से निकलने वाले कचरे में पॉलीथिन कम होने की बजाए बढ़ी है। निगम आयुक्त घरों से निकलने वाले कचरे को सेग्रीगेट करने पर सबसे ज्यादा जोर दे रहे हैं। इसके लिए उन्होंने 54 टीम भी बनाई है। हर वार्ड के लिए एक नोडल अफसर भी है। इसके बावजूद घरों से निकलने वाली पॉलीथिन कम नहीं हो रही है।  शहर के 54 वार्ड से 90 गाड़ियों के जरिए कचरा संग्रहण किया जाता है। गीला-सूखा कचरा अलग करके डालने के लिए कचरा संग्रहण वाहन में दो अलग-अलग खाके हैं। इसके अलावा सेहत के लिए खतरनाक और सेनिटरी नेपकिन के लिए अलग-अलग डिब्बे हैं। इन वाहनों के जरिए कचरा एकत्र कर शहर के दो ट्रांसफर स्टेशन एमआर-5 और गऊघाट पहुंचाया जाता है। जहां पर सूखे, गीले, खतरनाक कचरे को अलग-अलग किया जाता है। सूखे और गीले कचरे को गोंदिया ट्रेंचिंग ग्राउंड भेजा जाता है वहां पर इससे खाद बनाई जाती है लेकिन यहां भी खाद बनाने में पॉलीथिन को अलग करना सबसे मुश्किल और ज्यादा समय लेने वाला काम होता है। जिससे खाद बनाने की प्रक्रिया में ज्यादा समय लग रहा है। निगम उपायुक्त योगेंद्र पटेल का कहना है कि पॉलीथिन अलग लेने का काम जारी है। शहर से 180 से 200 टन कचरा औसत तौर  पर रोज निकल रहा है। इसमें 30 फीसदी पॉलीथिन होती है। लाॅकडाउन के पहले यह 15 फीसदी थी। 

पहले रियूज करते थे अब यूज एंड थ्रो
पॉलीथिन का कचरा बढ़ने का एक कारण है कि पहले पॉलीथिन को रियूज कर लिया जाता था यानी बाजार से मिली पॉलीथिन को घर में सहेजकर रखा जाता था। जरूरत पड़ने पर उसे ही बाजार से सामान लेने के लिए ले जाते थे लेकिन अब जो सामान बाजार से पॉलीथिन में लेकर आते हैं। उस पॉलीथिन को यूज एंड थ्रो की तरह उपयोग किया जा रहा है। कई बार तो पॉलीथिन को घर के बाहर ही डस्टबिन में फेंक दिया जाता है। 
जुर्माना वसूलने तक चली कार्रवाई 
निगम के अमले ने शहर के प्रमुख बाजारों को पॉलीथिन मुक्त करने का दावा किया था। इसमें तहत गोपाल मंदिर, महाकालेश्वर, छत्रीचाैक, सराफा आैर फ्रीगंज के प्रमुख बाजार पॉलीथिन मुक्त करना था। निगम ने शुरुआत भी की लेकिन वह जुर्माना वसूलने से आगे नहीं बढ़ी। निगम ने पॉलीथिन मुक्ति के लिए रैली, नुक्कड़ नाटक भी किए लेकिन वे ज्यादा प्रभाव नहीं छोड़ सके। 

ऐसे रोक सकते पॉलीथिन का उपयोग

  • लोगों को पॉलीथिन का उपयोग करने के लिए हतोत्साहित करना।
  • सब्जी, फल बेचने वालों को कपड़े की थैली का उपयोग करने के लिए प्रोत्साहित करना। जब भी घर से बाजार निकलें कपड़ा या जूट बैग साथ लेकर अवश्य जाएं।
  • दुकानदार पॉलीथिन में सामान दे रहा है तो विरोध करें और उसे पॉलीथिन प्रयोग न करने की सलाह दें।
  • न खुद और न ही दूसरों को प्लास्टिक बैग का उपयोग करने दें।
  • अपने बच्चों को भी प्लास्टिक बैग के नुकसान के बारे में बताएं। 
  • दुकानदार ग्राहकों से कपड़े या पेपर बैग लाने की लिए कहें।
  • सरकार को भी इस ओर और ज्यादा ध्यान देना होगा और कड़े नियम लाने होंगे। 

(स्वच्छता के ब्रांड एंबेसेडर डॉ.डीपी शर्मा के अनुसार)
डॉक्टर बोले- चारा नहीं खाती ऐसी गायें
गायें पॉलीथिन खा लेती हैं। यह पेट में जम जाता है, पचता नहीं है। जिससे डायजेशन बिगड़ जाता है। वे खाना छोड़ देती हैं। उनका शरीर अंदरुनी फैट्स और प्रोटीन से उनके पोषण की पूर्ति करता रहता है लेकिन यह क्रम 15 से 20 दिनों तक ही चलता है। जिसका असर यह होता है कि चमड़ी और हड्डियां आपस में चिपकी सी नजर आने लगती हैं। ऐसे में वे दम तोड़ देती हैं। -डॉ.उदयवीर सिंह माहौर, पशु चिकित्सक

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