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मुगलकाल में भी वंदनीय रहे भगवान श्रीराम:400 साल पहले तीर्थ यात्रियों को अयोध्या जाने पर मिलता था राम दरबार का सिक्का, सम्राट अकबर ने राम के आदर्शों को जन- जन तक पहुंचाने को जारी किए थे

उज्जैन6 महीने पहले
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उज्जैन के महिदपुर में ऐसे 40 से अधिक सिक्कों का सबसे अधिक संग्रहण है। - Dainik Bhaskar
उज्जैन के महिदपुर में ऐसे 40 से अधिक सिक्कों का सबसे अधिक संग्रहण है।
  • देश में उज्जैन के महिदपुर में हैं ऐसे सबसे ज्यादा 40 दुर्लभ सिक्के
  • मध्य प्रदेश के उज्जैन में भी भगवान श्रीराम से जुड़ी किवदंतियां मिलती हैं

आशीष दुबे, अयोध्या में 5 अगस्त को राम मंदिर निर्माण के नींव पूजन कार्यक्रम की तैयारियां चल रही हैं। इस उत्सव के साक्षी बनने के लिए रामभक्त उत्सुक हैं। मध्य प्रदेश के उज्जैन में भी भगवान श्रीराम से जुड़ी किवदंतियां मिलती हैं। सैकड़ों वर्ष पहले भी उज्जैन सहित मालवा के लोग तीर्थ यात्रा के रूप में अयोध्या जाया करते हैं। तब अयोध्या से यह लोग राम दरबार के सिक्के लेकर आते थे। खास बात यह है कि पूरे देश में उज्जैन के महिदपुर में ऐसे 40 से अधिक सिक्कों का सबसे अधिक संग्रहण है। भगवान श्रीराम के यश और आदर्शों का प्रभाव इतना अधिक था कि मुगल शासक अकबर ने भी 16-17वीं शताब्दी के बीच श्रीराम के आदर्शों को जन-जन तक पहुंचाने के लिए सिक्के जारी किए थे।

महिदपुर के अश्विनी शोध संस्थान में इन दुर्लभ सिक्कों का संग्रहण है। 80 साल पुराने संस्थान के निदेशक एवं जाने-माने मुद्राशास्त्री डॉ. आरसी ठाकुर ने बताया कि 16वीं शताब्दी के यह सिक्के उन्हें उनके पिता पर्वत सिंह ठाकुर से प्राप्त हुए थे। पर्वत सिंह ठाकुर भी सिक्कों का संग्रहण करने का शौक रखते थे। डॉ. ठाकुर ने बताया चांदी और पीतल के ऐसे 40 से अधिक सिक्के उनके पास हैं, जिन पर संवत् 1740 अंकित है। इन सिक्कों के एक भाग पर राम दरबार का दृश्य अंकित है, जो रामराज्य के राजसी वैभव और समृद्धता को दर्शाता है। वहीं सिक्के के पीछे की ओर भगवान राम और लक्ष्मण के चित्र के साथ संवत् 1740 अंकित है। उज्जैन के गढ़कालिका, अंकपात मार्ग, महिदपुर आदि क्षेत्रों में खुदाई के दौरान यह सिक्के प्राप्त हुए हैं।

मुद्राशास्त्री डॉ. ठाकुर ने बताया पाकिस्तानी पुराविद् प्रो. नसीम खान ने कुशाण कालीन पेशावर क्षेत्र का उत्खनन किया था। उत्खनन के दौरान उन्हें आयताकार एक स्वर्ण मुद्रिका (गोल्ड सील) मिली थी। इस पर ब्राह्मी लिपि में श्री सीताराम लेख उल्टे अक्षरों में उकेरा हुआ है। लिपि की बनावट के आधार पर यह मुद्रिका दूसरी-तीसरी ईसा की मानी गई है।

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