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ब्लैक फंगस से हार रहा:7 मरीजों की आंखें निकालना पड़ी, 7 के ब्रेन में पहुंची फंगस, 19 मरीज अभी भी हॉस्पिटल में

उज्जैन25 दिन पहले
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अस्पताल में भर्ती ब्लैक फंगस का मरीज। - Dainik Bhaskar
अस्पताल में भर्ती ब्लैक फंगस का मरीज।
  • कोरोना से जंग जीतता जा रहा उज्जैन

कोरोना से जीत चुके उज्जैन में अब तक ब्लैक फंगस के मरीज बीमारी से जूझ रहे हैं। ब्लैक फंगस के मरीजों में से सात मरीजों की आंख निकालना पड़ी। अब वे एक आंख से नहीं देख सकेंगे। इनमें से एक महिला और शेष 35 से 70 साल तक के पुरुष मरीज थे। ये सभी मरीज अब हॉस्पिटल से डिस्चार्ज हो चुके हैं। सात मरीजों के ब्रेन तक फंगस पहुंच गई थी, जिनमें से पांच मरीजों को इंदौर रैफर करना पड़ा और दो मरीजों को मेडिकल कॉलेज अस्पताल में ही इलाज किया गया।
कोरोना काल में लाइन ऑफ ट्रीटमेंट के तहत दी गई स्टेरॉयड से कोविड के 148 से ज्यादा मरीजों में ब्लैक फंगस हो गई। इसका असर मरीजों की आंख और पेट पर पड़ा। ऐसे में सात मरीजों की आंख निकालना पड़ी और दूसरे मरीजों के पेट से फंगस निकाली गई। वर्तमान में आरडी गार्डी मेडिकल कॉलेज अस्पताल में 5 और जिला अस्पताल के ब्लैक फंगस वार्ड में 14 मरीज भर्ती हैं।
7 मरीजों की आंखें निकालना पड़ी, बाकी मरीजों का प्राइवेट अस्पतालों में इलाज चल रहा है। मेडिकल कॉलेज में कुल 110 मरीज तथा जिला अस्पताल में 38 मरीज भर्ती हुए। मेडिकल कॉलेज से 105 तथा जिला अस्पताल से 10-12 मरीज डिस्चार्ज हाे चुके हैं तथा आंख तथा ब्रेन से संबंधित करीब 12 मरीजों को यहां से इंदौर या आरडी गार्डी मेडिकल अस्पताल में रैफर किया है तथा 14 मरीजों का अभी इलाज चल रहा है। जिला अस्पताल में ब्लैक फंगस वार्ड की प्रभारी और ईएनटी स्पेशलिस्ट डॉ. अंशु वर्मा ने बताया मैंने अब तक 15 मरीजों की सर्जरी यहीं पर की है। 14 मरीजों का इलाज अभी जारी है, जिनके स्वास्थ्य में सुधार है।
मरीजों की हालात अभी ठीक है
मेडिकल कॉलेज में भर्ती हुए करीब 110 मरीजों में से सात मरीजों की आंख निकालना पड़ी है। मरीज अब ठीक हैं और हॉस्पिटल से डिस्चार्ज हो चुके हैं। मरीजों के पेट से भी फंगस निकाली है। हॉस्पिटल में अब केवल पांच मरीज भर्ती है। - डॉ. सुधाकर वैद्य, ईएनटी स्पेशलीस्ट, मेडिकल कॉलेज

इंजेक्शन का खर्च नहीं उठा पाए, जिला अस्पताल में शिफ्ट होना पड़ा
कई मरीज तो ऐसे भी हैं जो कि दूसरे अस्पताल में इलाज करवाने के बाद यहां आए हैं, यहां उन्हें एम्फोटेरिसिन-बी इंजेक्शन लगाए जा रहे हैं। ये वे मरीज हैं जो कि इंजेक्शन का खर्च नहीं उठा पा रहे थे, इसलिए जिला अस्पताल में शिफ्ट हुए हैं। उन्हें यहां पर मुफ्त में इंजेक्‍शन लगाए जा रहे हैं। हालांकि अब तक ब्लैक फंगस के किसी भी मरीज की मौत का मामला सामने नहीं आया है।

निमोनिया के मरीज अब भी आ रहे
कोरोना से ठीक हो चुके मरीजों को दूसरी बीमारियां होने लगी है। जिसमें उनके लंग्स में खराब हुए हैं और निमोनिया भी हो रहा है। ऐसे मरीज इलाज के लिए प्राइवेट या सरकारी अस्पतालों में पहुंच रहे हैं।
50-60 इंजेक्शन हर रोज मिल रहे ड्रग इंस्पेक्टर धर्म सिंह कुशवाह ने बताया 50-60 इंजेक्शन हर रोज उपलब्ध हो पा रहे हैं। जिन्हें डिमांड के तहत मरीजों तक पहुंचाए जा रहे हैं। अब इंजेक्शन की शार्टेज नहीं है।

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