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सहर्ष हॉस्पिटल प्रबंधन और स्टाफ की लापरवाही से मौत:अस्पताल प्रबंधन के लालच ने छीन ली जिंदगी अफसोस है पापा...हम आपको नहीं बचा पाए

उज्जैन10 दिन पहले
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शहर के उदयन मार्ग स्थित सहर्ष हॉस्पिटल प्रबंधन पर इलाज में बरती गई कोताही से मरीज की मौत होने का आरोप लगा है। मीडिया को जारी बयान में मृतक के बेटे ने सिलसिलेवार अस्पताल प्रबंधन और यहां के स्टाफ की लापरवाही पर सवाल उठाए हैं। अस्पताल में पिता की हत्या का आरोप लगाने वाले मरीज के बेटे ऋषिनगर एक्सटेंशन निवासी सुमित शमी से सुनिए उनकी आपबीती।

मेरे पिताजी (राजमोहन शमी 72) का स्वास्थ्य 12-14 दिनों से खराब था। इलाज के लिए ले जाने पर विशेषज्ञ डॉक्टर ने ऑक्सीजन सेचुरेशन लेवल गिरने से पिताजी को ऑक्सीजन बेड पर एडमिट कराने की सलाह दी। सरकारी अस्पताल में बेड उपलब्ध नहीं होने से 24 अप्रैल की रात पिताजी को सहर्ष हॉस्पिटल के आईसीयू वार्ड में भर्ती करा दिया। तब ऑक्सीजन लेवल 78% था। डॉक्टर ने तुरंत ऑक्सीजन लेवल 95% पर मेंटेन कर दिया। यहां ऑक्सीजन बेड उपलब्ध था। अस्पताल प्रबंधन ने बेहतर व्यवस्था का दावा भी किया।

मगर दावे और हकीकत में अंतर हमें दूसरे दिन से ही समझ आने लगा। परिजनों की अनुपस्थिति में नर्सिंग स्टाफ उन्हें न तो समय पर दवाइयां देता था, न जरूरत पड़ने पर पिताजी का दैनिक कार्य में सहयोग करता था। स्टाफ से सहयोग करने की गुहार लगाने पर हर बार टाल दिया जाता। डॉक्टर जब राउंड पर होते तब ऑक्सीजन का स्तर ठीक हो जाता था। ऐसे में परिवार के अन्य सदस्यों को पिताजी को रात में अकेले छोड़ने से डर लगने लगा। क्योंकि सुबह अस्पताल पहुंचने पर पिताजी हमें बगैर ऑक्सीजन मास्क के बेसुध हालत में मिलते थे।

रात में उनके हाथों को पलंग से बांध कर रखा जाता था, उनके बेड के ऊपर पंखा तक नहीं था, चार दिन तक उन्हें नित्यकर्म नहीं कराया। खाना नहीं खा पाते थे। ऑक्सीजन सेचुरेशन लेवल डाउन होने की शिकायत पर ही वे सप्लाई और फ्लो बढ़ाने के लिए रिसेप्शन को कॉल करते। हमें रोज सुबह ऑक्सीजन सप्लाई की कमी बताकर स्वयं ही व्यवस्था करने को कहा जाता। चूंकि मम्मी, मेरी पत्नी, छोटा भाई भी संक्रमित हैं, उनका इलाज घर पर ही चल रहा है। ऐसे में व्यक्तिगत तौर पर ऑक्सीजन का प्रबंध कर पाना मेरे लिए संभव नहीं था।

इंजेक्शन लेकर लौटा तब तक हमें छोड़कर जा चुके थे बाबूजी

मैंने मेरे पिताजी को रोज बदतर स्थिति में जाते हुए देखा। चाहते हुए भी कुछ नहीं कर पाता। हर दिन पिताजी की हालत खराब हो रही थी। 28 अप्रैल की दोपहर इंजेक्शन लेकर लौटा तो वे बेसुध थे। उनका ऑक्सीजन लेवल 30% पर आ गया था, जो सुबह तक 45 और एक दिन पहले 65 था, डॉक्टर से कहने पर ऑक्सीजन लेवल बढ़वाया। दोबारा मैं हॉस्पिटल द्वारा बताए इंजेक्शन लेने बाहर जाकर लौटा तो वे मृत थे। स्टाफ और ड्यूटी डॉक्टर उनको बचाने का व्यर्थ का ढोंग करने में जुटे थे।

मेरे बाबूजी तो जा चुके थे। यहां के डॉक्टर मरीजों की जान नहीं बचाते, नफा-नुकसान करने वाले मैनेजर हैं यह। नर्सिंग स्टाफ नौसिखिया है, मरीज के बिगड़ते स्वास्थ्य से कोई लेना-देना नहीं। डॉक्टर द्वारा कभी भी हमें उनकी स्थिति से अवगत नहीं कराया गया, उनके लिए किसी की जान की कीमत ही नहीं है। हमारे पिताजी हॉस्पिटल की अव्यवस्था के चलते हमसे हमेशा के लिए दूर हो गए। मीडिया के माध्यम से मैं ऐसे अस्पताल प्रबंधन पर कड़ी कार्रवाई की मांग करता हूं। यहां पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं थी, फिर भी बिल में 9600 रुपए ऑक्सीजन के वसूले गए।

स्टाफ की प्रोटेक्शन किट के नाम पर भी खूब बिल बनाया गया। जबकि स्टाफ को तो पिताजी के पास जाने तक में हिचक होती थी। वार्ड बॉय अपना नाम बता के बोलता था कि जिससे शिकायत करना है, कर दो। हमारी शिकायत को नजरअंदाज किया जाता रहा। अब अफसोस करने के अलावा हमारे पास कुछ नहीं है। इधर मामले में अस्पताल प्रबंधक डॉ. हर्ष मंगल ने आरोपों काे खारिज कर मरीज को हरसंभव इलाज देना बताया है।

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