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परंपरा:सवारी के पहले महाकाल के बाण लिंग से चांदी के स्वरूप में होते हैं प्राण प्रतिष्ठित

उज्जैन2 महीने पहले
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  • सवारी में चैतन्य स्वरूप के दर्शन का श्रद्धालुओं को मिलता है पुण्य

महाकालेश्वर की सवारी में निकलने वाले भगवान के चांदी के स्वरूप को पालकी में विराजित करने के लिए सभा मंडप में बाण लिंग की पूजा कर चैतन्य किया जाता है। बाण लिंग से भगवान महाकाल की आत्म ज्योति को मंत्रों के माध्यम से चांदी की प्रतिमा में प्राण प्रतिष्ठित किया जाता है। इस पूजन के बाद ही चांदी की प्रतिमा चैतन्य स्वरूप में आती है ताकि सवारी में भगवान के चलित स्वरूप के दर्शन से भी श्रद्धालुओं को पुण्य प्राप्त हो। जब तक सवारी नगर भ्रमण पर रहती है, तब तक मंदिर के गर्भगृह में विराजित ज्योतिर्लिंग में शिव समाधिस्थ अवस्था में रहते हैं। यह दर्शन भी पुण्यदायी होते हैं। यानी सवारी के दौरान मंदिर और पालकी में विराजित प्रतिमा किसी के भी दर्शन से पुण्य प्राप्त होता है। महाकालेश्वर की सवारी के पहले मंदिर के सभागृह में भगवान के चांदी के स्वरूप का पूजन होता है। शायद यह बात बहुत कम श्रद्धालुओं को पता हो कि जब भी भगवान महाकाल के चांदी के स्वरूप को चलित स्वरूप को सवारी के रूप में निकालने का अवसर आता है, तब चांदी की प्रतिमा का सभागृह में पूजन होता है। यहां दो बार पूजन होता है। पहले मुख्य पुजारी पं. घनश्याम शर्मा चांदी की प्रतिमा के सामने बाण लिंग का पूजन करते हैं। बाण लिंग महाकाल की निराकार आत्म ज्योति है। वे मंत्रों के माध्यम से निराकार बाण लिंग की आत्म ज्योति को साकार चांदी की प्रतिमा में प्राण प्रतिष्ठित करते हैं। इस पूजन के बाद ही साकार प्रतिमा चैतन्य होती है। इस पूजन के बाद साकार चांदी की प्रतिमा का पूजन किया जाता है। पूजन के बाद चांदी के स्वरूप को पालकी में विराजित कर सवारी रवाना होती है। रामघाट पर पूजन के बाद सवारी मंदिर लौटने पर चांदी की प्रतिमा खजाने में रख दी जाती है। बाण लिंग को फिर नैवेद्य कक्ष में प्रतिष्ठित करते हैं। यह बाण लिंग अनादि माना गया है।

पूजन के लिए बाण लिंग को रामघाट पर भी ले जाते हैं
मंदिर के पं. महेश पुजारी कहते हैं- शिव निराकार ज्योति स्वरूप है, जो अनादि बाण लिंग के स्वरूप में है। सवारी लौकिक परंपरा में साकार शिव का उत्सव है। साकार प्रतिमा में निराकार शिव तत्व की चैतन्यता आने पर ही सवारी के दौरान भगवान का यह स्वरूप जीवंत दिखाई देता है। दर्शनार्थी इस चैतन्य स्वरूप को निहार कर ही भाव विभोर होते हैं। जब साकार प्रतिमा में आत्म ज्योति समाहित रहती है, तब मंदिर के शिवलिंग में महाकाल समाधिस्थ अवस्था में रहते हैं। ऐसे में श्रद्धालु पालकी में विराजित प्रतिमा या मंदिर में विराजित शिवलिंग किसी के भी दर्शन करें, उन्हें पुण्य प्राप्त होता है। सभा मंडप में पूजन के बाद बाण लिंग को रामघाट ले जाया जाता है। वहां शिप्रा पूजन के दौरान भी इसकी पूजा होती है।

रोज होता है बाण लिंग का पूजन
पं. आशीष पुजारी के अनुसार बाण लिंग नैवेद्य कक्ष में विराजित हैं। रोज उनका पूजन होता है। सवारी के लिए बाण लिंग को सभा मंडप ले जाते हैं। सवारी समाप्त होने के बाद चांदी के स्वरूप में प्रतिष्ठित भगवान की चैतन्य आत्म ज्योति को वापस बाण लिंग में प्रविष्ट कराया जाता है।

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