लॉकडाउन संकट / दो महीने से बसों के पहिए थमे, शासन की चेतावनी- 31 तक जमा करें टैक्स

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  • मप्र बस ऑनर्स एसोसिएशन के संचालकों ने शासन को लिखा- जब बसें चली नहीं तो टैक्स किस बात का?

दैनिक भास्कर

May 23, 2020, 05:00 AM IST

उज्जैन. लॉकडाउन में प्रदेशभर में दो महीने से 35 हजार यात्री बसों के चक्के थमे हुए हैं। इनमें 500 बसें उज्जैन जिले की हैं। इन परिस्थितियों के बीच जब शासन ने बस मालिकों को 31 मई तक टैक्स जमा के निर्देश दिए तो इन्होंने हाथ खींच लिए। 
मप्र बस ऑनर्स एसोसिएशन के उज्जैन सहित प्रदेशभर के पदाधिकारियों ने ये कहते हुए कि बसें असंचालन की स्थिति में आपके कारण आई हैं। जब परिवहन ही नहीं हुआ तो टैक्स किस बात का? 
बस मालिकों व शासन के बीच टैक्स को लेकर तनातनी ऐसे समय में सामने आई हैं जब शासन लॉकडाउन खत्म होने पर बसों का संचालन किस तरह से करवाया जाएं की प्लानिंग कर रहा है। बहरहाल जनता के लिए चिंता की बात ये कि इन दोनों पक्षों की खींचतान लंबी चलती हैं तो कम उम्मीद हैं कि लॉकडाउन के बाद भी बसों का संचालन आसानी से शुरू हो पाएगा।
एक बस के 10 हजार रुपए प्रति माह मांग रहा शासन 
बस का संचालन हो रहा है तो ये टैक्स 200 रुपए पहले 100 किमी तक प्रति सीट और आगे प्रत्येक 10 किमी पर 12 रुपए के हिसाब से लगता है। प्रति माह इसे चुकाना होता है।
यात्री बस खड़ी हुई तो 10 हजार रुपए माह स्पेयर टैक्स चुकाना रहता है।
इधर इन दो प्रकार की बसों पर टैक्स का यह स्लैब लागू है
निजी बस : 26 हजार रुपए तीन महीने
स्कूल बस : 50 सीटर पर तीन महीने का 1500 रुपए। 
- जैसा बस संचालकों ने बताया। 
ऐसे समझे टैक्स का गणित : औसतन एक यात्री बस दिनभर में 400 किमी चलती है। इस तरह जो टैक्स का स्लैब लागू हैं उसके मान से प्रति सीट पहले 100 किमी के 200 रुपए। बाद के प्रत्येक 10 किमी के 12 रुपए के हिसाब से बचे हुए 300 किमी के हुए 360 रुपए। इस तरह प्रति सीट कुल टैक्स 560 रुपए हुआ। यानी यदि बस 50 सीटर है तो ये टैक्स प्रति माह 28 हजार रुपए होता है। 
बसों को नॉन यूज घोषित करें 
छत्तीसगढ़, गुजरात में केंद्र की एडवाइजरी के आधार पर यात्री बसों को नॉन यूज घोषित कर दिया। मप्र में ऐसा होना चाहिए। बसें चली ही नहीं तो टैक्स का सवाल ही नहीं उठता है। 
शिवकुमार शर्मा, मप्र बस आनर्स एसो. 
टैक्स जमा करने के संबंध में शासन के निर्देश आए है लेकिन 31 मई में वक्त है। हो सकता हैं कि परिस्थितियों को देखते हुए शासन दूसरा निर्णय ले लें। 
रीना तिराड़े, आरटीओ

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