कोरोना काल की एक समस्या:लिप्स रीडिंग की बजाय अब बधिरों के लिए साइन लैंग्वेज का इस्तेमाल

उज्जैनएक वर्ष पहले
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  • मुंह पर मास्क बंधा होने से बधिर नहीं कर पा रहे लिप्स रीडिंग

कोरोना काल में मुंह पर मास्क अनिवार्य हो गया है। मास्क लगा होने के कारण अब होंठों का मूवमेंट पता नहीं चल सकता और लिप्स रीडिंग भी नहीं की जा सकती। सुन नहीं सकने वाले बधिरों को इस कारण सबसे ज्यादा परेशानी आ रही है। इसलिए इस संकट में उन्हें लिप्स रीडिंग की बजाय साइन लैंग्वेज के माध्यम से अपनी बात दूसरे तक पहुंचाना पड़ रही है। जिन बधिरों को साइन लैंग्वेज नहीं आती, उन्हें भी साइन लैंग्वेज का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। मनोविकास विशेष विद्यालय में ऐसे कई बधिर विद्यार्थी हैं। मनोविकास के संचालक फादर जार्ज ने बताया मनोविकास छात्रावास में अभी तीन विद्यार्थियों को यह लैंग्वेज सिखाई जा रही है। यह विद्यार्थी वाट्सएप पर वीडियो कॉलिंग के माध्यम से भी लिप्स रीडिंग के जरिए बातचीत करते हैं। 22 साल के मूकबधिर तेजस ललित पिछले 4 साल से छात्रावास में रहते हैं। लिप्स रीडिंग के अलावा तेजस को अमेरिकन साइन लैंग्वेज भी आती है। मास्क पहनने के कारण अब वे छात्रावास की शिक्षिकाओं से साइन लैंग्वेज के माध्यम से ही बात करते हैं। वहीं 2008 से रह रहे एक अन्य मूकबधिर शुभम परमार भी यहां इंडियन साइन लैंग्वेज के माध्यम से बातचीत करने में माहिर हो चुके हैं। शुभम आईटीआई से डिप्लोमा भी कर रहे हैं। 15 वर्षीय संप्रदा सिंह जाट की सुनने की क्षमता बेहद कम है। इसलिए उनकी मां दीपाली उन्हें साइन लैंग्वेज सीखा रही हैं।

अमेरिकन से ज्यादा कठिन है इंडियन साइन लैंग्वेज, सीखने में तीन साल लगते
साइन लैंग्वेज में इशारों और स्पर्श के माध्यम से अपनी बात दूसरे तक पहुंचाई जाती है। मनोविकास विशेष विद्यालय की शिक्षिका संध्या लकरा ने बताया अमेरिकन साइन लैंग्वेज में दो लोग एकदूसरे का हाथ पकड़ कर अंगुलियों के इशारे से साइन लैंग्वेज में बातचीत कर सकते हैं। जबकि इंडियन साइन लैंग्वेज थोड़ी कठिन है। इसमें भी इशारे और स्पर्श, दोनों माध्यम से साइन लैंग्वेज के जरिए बातचीत की जा सकती है। अमेरिकन साइन लैंग्वेज को सीखने में करीब डेढ़ से दो वर्ष का समय लगता है, जबकि थोड़ा कठिन होने के कारण इंडियन साइन लैंग्वेज को सीखने में लगभग तीन वर्ष तक का समय लग जाता है।

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