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  • After Conducting Soil Testing, Put Only The Necessary Nutrients In The Ground, The Seeds Also Changed; The Result Yielded Three Quintal Bigha Production

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ऐसे भी किसान:मिट्टी परीक्षण करवाकर जमीन में जरूरी पोषक तत्व ही डाले, बीज भी बदला; नतीजा तीन क्विंटल बीघा उत्पादन मिला

शाजापुरएक महीने पहले
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पीला मोजेक सहित कीट व्याधि के डबल अटैक के बावजूद जिले के कुछ किसानों ने बेहतर सोयाबीन उत्पादन करने का कमाल कर दिखाया है। थाेड़ा बदलाव कर इन किसानों ने न सिर्फ अपनी फसल बचाई। बल्कि अच्छी क्वालिटी के सोयाबीन पैदाकर अन्य किसानों काे भी फसल चक्र बुआई का तरीका बदलने का संदेश दे डाला।

ऐसे ही एक किसान शहर के कैलाश मटोलिया हैं। जिन्होंने पिछले दो-तीन साल के रिकाॅर्ड में सीजन के अंत में होने वाली बारिश का देख इस साल ज्यादा अवधि में पकने वाला बीज जेएस 20-34 लगाने का निर्णय लिया। इससे पहले खेत तैयार करने के बाद कृषि विशेषज्ञों से मिट्टी परीक्षण रिपोर्ट के आधार पर जमीन के लिए जरूरी पोषण तत्वाें की जानकारी ली और निर्धारित मात्रा में पोषक तत्व डाले।

बीजोपचार के बाद खेत में फसल की बोवनी कर दी। इधर, सीजन के अंत में जब सितंबर माह में बारिश हुई, उस समय सोयाबीन फसल हरी थी। बारिश का फसल काे फायदा मिला और दाने का आकार और अच्छा हो गया। बड़े आकर के अच्छी क्वालिटी के सोयाबीन दाने बनने से उन्हंे प्रति बीघा 3 क्विंटल सोयाबीन का उत्पादन मिला।

अन्य किसान अभी से बीज की डिमांड करने लगे

मटोलिया को विपरीत मौसम में बेहतर सोयाबीन उत्पादन लेते देख अब अन्य किसान भी उनसे मशविरा लेने पहुंच रहे हैं। इतना ही नहीं अपना पुराने बीज का मोह छोड़, वे भी अब बीज बदलने की इच्छा जताने लगे हैं। इसके लिए वे मटोलिया के खेत से मिली फसल को ही बीज के लिए खरीदी करने की डिमांड भी करने लगे हैं।

जैविक खेती करने वाले किसानों को भी नुकसान नहीं

जिले में जैविक खेती करने वाले शरद भंडावत, जुझारसिंह सहित 50 से ज्यादा किसानों पर भी इस साल के विपरीत मौसम बेअसर रहा। इन किसानों ने अपने खेत में गोबर व केंचुआ खाद का उपयोग किया। जागरूक किसानों ने फसल चक्र को भी अपनाया। यही वजह है कि इन किसानों की फसल पर इस साल न तो पीला मोजेक व न ही कीट व्याधि का अटैक हुआ।

इसलिए न बीमारी आई, न ही बारिश में खराब हुई

किसान मटोलिया ने बताया कि उन्होंने इस साल 90 दिन में पककर तैयार होने वाले जेएस 95-60 बीज के बजाय 110 से 120 दिन में पकने वाले बीज जेएस 20-34 की बुआई की। बीज बदल देने से फसल बदल गई। इससे कीट व्याधि से लेकर पीला मोजेक का अटैक भी नहीं हुआ। उन्होंने बताया कि पिछले दो तीन साल से लगातार सीजन के अंत में बारिश और इससे पककर तैयार फसल के खराब होते देखकर ही इस साल ज्यादा समय में पकने वाली फसल बोई।

बोवनी का तरीका बदल फसल चक्र अपनाने की बेहद जरूरत

जमीन में लगातार एक ही तरह की फसल बोने के कारण बीमारियों का खतरा ज्यादा रहता है। यही वजह है कि जिले के 80 प्रतिशत रकबे में पिछले कई सालों से किसान जेएस 95-60 व सम्राट सोयाबीन की बोवनी कर रहे हैं।

इन फसलों में लगातार बीमारियों का प्रकोप बढ़ने लगा और पिछले दो तीन सालों से फसल खराब होना शुरू हो गई। किसानों को अब हर हाल में फसल चक्र अपनाते हुए बीज या फसल को बदलना होगी। बुआई का तरीका भी परंपरागत होने के बजाए अब रेज बेज्ड होना चाहिए।

- डॉ. कायमसिंह, वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक कृषि विज्ञान केंद्र शाजापुर

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