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पहली बार मालवा की धरती से मिला खजाना:औरंगजेब के जमाने के सिक्के नींव खोदने पर मिले, एक साल बाद बेचने निकले तो पकड़ाए

शाजापुर24 दिन पहले
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शाजापुर. पुलिस द्वारा जब्त चांदी और सोने के सिक्के। - Dainik Bhaskar
शाजापुर. पुलिस द्वारा जब्त चांदी और सोने के सिक्के।
  • औरंगाबाद टकसाल में 363 साल पहले ढले सोने-चांदी के सिक्कों का खजाना पहली बार मालवा की धरती से मिला

ऐतिहासिक धरोहरों को अपने अंदर छुपाए बैठी मालवा की धरती से अब राजा-महाराजाओं का खजाना भी निकलने लगा है। 163 से ज्यादा सोने-चांदी के सिक्के शाजापुर के ग्राम पचोला के मजदूरों को नींव खोदते समय एक साल पहले मिले थे। इस खजाना का तीनों ने बंटवारा कर अपने-अपने घरों में गड्ढा कर छिपा दिए, ताकि किसी को भनक न लगे। लेकिन बुधवार को जब वे इसे बाजार में बेचने के इरादे से निकले तो पुलिस ने उन्हें दबोच लिया। मजदूरों के पास मिले सिक्के देख हर कोई दंग रह गया।

यह साधारण सिक्के नहीं, बल्कि औरंगजेब के जमाने के बताए जा रहे हैं। भास्कर ने इन सिक्कों की पड़ताल अश्विनी शोध संस्था महिदपुर के मुद्रा विशेषज्ञ डॉ.आर.सी. ठाकुर से कराई तो उन्होंने बताया कि मालवा की धरती से यह सिक्के मिलना अपने आप में दुर्लभ है।
बेरछा थाना प्रभारी रवि भंडारी ने जानकारी देते हुए बताया कि उन्हें मुखबिर से सूचना मिली कि तीन ग्रामीण व्यक्तियों के पास जमीन खुदाई के दौरान सिक्के मिले हैं, जो उन्हें बेचने के इरादे से बेरछा नाके के पास घूम रहे हैं। इस सूचना पर पुलिस ने घेराबंदी की तो तीनों व्यक्ति भागने लगे। इन्हें पुलिस ने पकड़कर पूछताछ की ताे जमीन से निकला खजाना सामने आया।
औरंगजेब के जमाने के सिक्के नींव खोदने पर मिले, एक साल बाद बेचने निकले तो पकड़ाए....

पुलिस ने मौके से जितेंद्र के पास से 60 चांदी के सिक्के व 7 सोने तथा किशन के पास से 60 चांदी और 6 सोने के सिक्के जब्त किए, जबकि संतोष के पास से 30 चांदी के सिक्के मिले। जिले में पहली बार खजाना मिलने का मामला सामने आने के बाद पुलिस भी पूरी जानकारी देने से बचती रही। हालात यह हो गए कि ग्रामीण युवकों से शपथ पत्र लिखने के बाद उन्हें छोड़ दिया गया, पर उन्होंने मीडिया से बात करने से साफ मना कर दिया।
बेरछा क्षेत्र में नींव खुदाई के दौरान मिला खजाना
संतोष, किशन और जितेंद्र को मिला खजाना, पुलिस की कहानी में एक साल पहले मिलना बताया जा रहा है। लेकिन भास्कर ने इन तीनों मजदूरों के गांव पचोला पहुंचकर पड़ताल की तो बड़ी बात यह सामने आई कि कोई भी ग्रामीण इस पूरे मामले में कुछ भी बोलने को तैयार नहीं था। लेकिन कुछ लोगों ने बताया कि करीब डेढ़ से दो साल पहले संतोष ने अचानक पक्का मकान बना लिया तो जितेंद्र और किशन के मकान निर्माण भी शुरू हो गए थे। एक ग्रामीण ने इन तीनों मजदूरों को उक्त खजाना बेरछा के आसपास से मिलने की संभावना जताई पर कैमरे के सामने चुप्पी साध ली।
एक साल तक छुपाए रखा
इधर, भास्कर ने जितेंद्र, किशन और संतोष से चर्चा की तो उन्होंने भी पुलिस द्वारा बताई पूरी कहानी ऐसी की ऐसी बता दी। जिसे उन्होंने तीनों में बांट लिया था। पर यह नहीं बताया कि कितना किसके पास था, जबकि पुलिस के अनुसार संतोष के पास से सिर्फ 30 सिक्के मिले, संतोष के अनुसार उसके खुद के मकान की नींव खुदाई में यह सिक्के एक मिट्टी के बर्तन में मिले थे। पुलिस द्वारा पकड़े जाने के डर से तीनों ने अपने अपने घरों में ही गड्ढा कर सिक्के गाड़ दिए थे।
आज इस्तगासा पेश करेंगे
बेरछा थाना प्रभारी भंडारी के अनुसार मामले में 403 आईपीसी, धारा 20 भारतीय निखात निधि अधिनियम 1878 के (दफीना एक्ट) के तहत गुरुवार को इस्तगासा कोर्ट में पेश की जाएगी। इसके बाद कलेक्टर द्वारा इसे शासन के खजाने में जमा कराया जाएगा।
बौद्धों का वर्चस्व और अरब सागर का व्यापारिक मार्ग
शाजापुर जिला ऐतिहासिक नजरिए से भी महत्वपूर्ण है। पुराविद् डॉ रमण सोलंकी के अनुसार इसे बौद्ध पथ माना जाता है। यानी इस क्षेत्र में बौद्ध धर्म का काफी वर्चस्व रहा है। इसके प्रमाण कुरावर में बौद्ध स्तूप के अवशेष मिलने और सारंगपुर व मक्सी में भी इस तरह के प्रमाण मिलते हैं। शाजापुर को मुगल शासक शाहजहां से जोड़ा जाता है। औरंगाबाद टकसाल की मुद्राएं शाजापुर पहुंचने का कारण उज्जैन से अरबसागर तक व्यापारी आते-जाते थे। व्यापारियों का मार्ग शाजापुर होकर ही था।

उज्जैन से शाजापुर होकर विदिशा होते हुए भरूच से अरब सागर की ओर व्यापारियों का आना-जाना था। उज्जैन रत्नों और मसालों की मंडी था। खासकर मोतियों का कारोबार उज्जैन से होता था। इसलिए उज्जयिनी के सिक्कों पर क्रास वाला व्यापारिक चिह्न था चारों दिशाओं के प्रतीक क्रास के चारों कोनों पर गोलाकार चिह्न हैं। उज्जैन के अरब सागर वाले पश्चिमी मार्ग में शाजापुर आता था।

363 साल पहले औरंगाबाद टकसाल में ढले
शाजापुर में मिले सोने के सिक्के औरंगजेब के समय के हैं। डॉ. ठाकुर के अनुसार यह सिक्के औरंगाबाद टकसाल में ढले दुर्लभ सिक्के हैं। मालवांचल में इस टकसाल के सिक्के मिलने का यह पहला मामला है। यह सिक्के 1658 से 1707 (हिजरी सन् 1068 से 1158) के हैं। इस पर 12 अंक लिखा है, जो महीने का प्रतीक है। इस तरह के सिक्के उज्जैन जिले के रूनीजा में सालों पहले स्व. डॉ. श्रीधर वाकणकर ने भी खोजे थे। यह सिक्के औरंगाबाद टकसाल के होने से खास है। एक सिक्के की कीमत लगभग 50 हजार रुपए हो सकती है।
सिक्कों की वर्तमान कीमत 8 लाख से ज्यादा
भास्कर ने पहले सिक्कों के ऐेतिहासिक महत्व की जानकारी जुटाई। इसके बाद सोने-चांदी का कारोबार करने वाले व्यापारियों से जानकारी जुटाई तो उन्होंने भी बताया कि आज के सोने से पुराना सोना ज्यादा शुद्ध होता है। सोने के सिक्कों का वजन 142.3 ग्राम तक है, वहीं चांदी के 150 कुल सिक्कों का वजन एक किलो 710 ग्राम है। चांदी के सिक्कों की कीमत 1 लाख 12 हजार रुपए के लगभग तो सोने के एक सिक्के की कीमत 50 हजार यानी कुल 13 सिक्कों की कीमत 6 लाख 50 हजार रुपए कीमत है।