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  • For The First Time, The Picture Proving The Claim That Made The Importance Of Rajarajeshwari Temple Special From The Point Of View Of Drones.

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नवरात्रि विशेष:पहली बार ड्रोन की नजर से राजराजेश्वरी मंदिर की महत्ता को खास बनाने वाले दावे को सही साबित करते तस्वीर

शाजापुरएक महीने पहले
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(बहादुर सिंह चौहान). शहर के बीच से निकली चीलर नदी किनारे स्थित मां राजराजेश्वरी माता मंदिर की महत्ता को लेकर कई साल से चर्चा है। मंदिर प्रबंधन का दावा है कि स्कंध पुराण में जिस 52वें गुप्त शक्तिपीठ का वर्णन है, वह स्थान यही है। यहां खुदाई में माता का दाहिना पैर मिलने के साथ ही चीलर नदी का अर्द्ध चंद्राकार किनारा, पास में शिव मंदिर व सामने श्मशान होना भी इसका प्रमाण है।

करीब 30 साल पहले चारों मठ के शंकराचार्यों ने भी मां राजराजेश्वरी मंदिर को शक्तिपीठ की मान्यता दी है। मंदिर के सामने माता के नाम से पहले शक्तिपीठ नहीं होने से ज्यादातर लोगों को जानकारी नहीं है। इसी को लेकर नवरात्रि पर दैनिक भास्कर टीम ने स्कंध पुराण में दर्ज प्रमाण व इस हकीकत से आमजन को अवगत कराने के लिए 400 फीट ऊंचाई से ड्रोन से तस्वीर ली। इसमें मंदिर के समीप से निकली चीलर नदी स्पष्ट रूप से चंद्राकार दिखाई दे रही है।

स्कंध पुराण में चंद्रभागा नदी का उल्लेख

मंदिर पुजारी अशोक नागर ने बताया इसी अर्द्ध चंद्राकार नदी को स्कंध पुराण में चंद्रभागा नदी के रूप में उल्लेखित किया है। पास में मंगलनाथ मंदिर है। यहां शिवलिंग से ही नदी के दूसरी तरफ स्थित श्मशान में जलती चिता दिखती है। इन्हीं प्रमाणों के आधार पर शंकराचार्यों ने मां राजराजेश्वरी मंदिर को 52वें शक्तिपीठ की मान्यता दी थी। 1992 शंकराचार्य स्वरूपानंदजी महाराज ने यहां रहकर माता मंदिर की विधि विधान से स्थापना भी कराई।

मां का पूरा नाम शंकराचार्य स्वरूपानंदजी महाराज ने दिया

मंदिर समिति के आशीष नागर ने बताया कि मंदिर स्थापना के बाद शंकराचार्य स्वरूपानंद जी महाराज ने मां राजराजेश्वरी का पूरा नाम (श्री अनंत कोटि, ब्रह्मांड नायिका, पराभट्‌टारिका भगवती ललितांबा महात्रिपुरसुंदरी श्री राजराजेश्वरी मां) दिया।

तभी से मंदिर के सभा मंडप के मुख्य गेट पर माता का यही नाम अंकित है। मंदिर समिति के आशीष नागर ने बताया कि चंद्रभागा नदी के समीप शक्तिपीठ होना और दूसरी तरफ श्मशान होने से मां राजराजेश्वरी माता मंदिर को तंत्र साधना के लिए भी खास माना जाता है। समीप मंगलनाथ मंदिर के गर्भ गृह से नदी के दूसरी तरफ श्मशान में जलती चिता दिखाई देने से इस साधना का महत्व और बढ़ गया है।

शंकराचार्य 35 साल पहले से आने लगे

मंदिर समिति के आशीष नागर ने बताया कि स्कंध पुराण में वर्णित जैसे साक्ष्य शाजापुर में होने की जानकारी मिलने पर 1985 में भानपुरा पीठ के शंकराचार्यजी शाजापुर आए। इसके बाद 1986-87 में कांचीपुरम के शंकराचार्य जी श्री जयेन्द्र सरस्वतीजी और बाद में 1992 को द्वारिका व बद्रीनाथ के शांति स्वरूपानंद जी महाराज ने शाजापुर आकर यहां के साक्ष्य देख शक्तिपीठ की मान्यता दी।

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