पंजाबी-हिंदी को जोड़ने वाले को पद्मश्री:डॉ. हरमोहिंदर सिंह ने 40 बच्चों को Ph.D. और 60 को M.Phil. करवाई, हिमाचल सेंट्रल यूनिवर्सिटी के चांसलर हैं

अमृतसर8 महीने पहले
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पंजाबी और हिंदी को जोड़ने वाले डॉ. हरमोहिंदर सिंह बेदी को पद्मश्री अवार्ड 2022 से सम्मानित किया गया है। भारत सरकार ने हिन्दी साहित्य में उनके योगदान को देखते हुए पहले उन्हें सेंट्रल यूनिवर्सिटी धर्मशाला का चांसलर नियुक्त किया और अब यह सम्मान दिया जा रहा है। हरमोहिंदर सिंह बेदी का प्रेम हिंदी के प्रति उनके पिता प्रीतम सिंह बेदी के कारण जागा।

पिता रेलवे में स्टेशन मास्टर थे तो उन्हें कभी हिमाचल तो कभी पंजाब में पढ़ने का मौका मिला। ग्रेजुएशन करते समय वह होशियारपुर में थे। तब उनके लेख व कविताएं छपनी शुरू हो चुकी थीं। इसके बाद उन्होंने गुरु नानक देव यूनिवर्सिटी से एमए हिंदी की, जहां उनके गुरु बने हिंदी क्रिटिक्स रमेश कुंतल बने। डॉ. रमेश के साथ उन्हें पंजाब में हिंदी साहित्य पर काम करने का मौका मिला। यह वह पंजाब था, जब हिमाचल का एक बड़ा हिस्सा हरियाणा पंजाब में ही था।

हिंदी-पंजाबी दोनों भाषाओं में MA
डॉ. हरमोहिंदर सिंह बेदी ने पंजाबी और हिंदी के बीच पुल बनाने का काम किया। इसके लिए उन्होंने एमए हिंदी करने के साथ-साथ भागलपुर यूनिवर्सिटी से डी लिट और पंजाबी यूनिवर्सिटी पटियाला से एमए पंजाबी भी की। एमए पंजाबी करने का मकसद हिंदी और पंजाबी के बीच के पुल को जानना था। अपने जीवन काल में हिंदी सेवी पुरस्कार प्राप्त करने के अलावा उन्हें शिरोमणि हिंदी पुरस्कार, राज भाषा पुरस्कार भी प्राप्त किया। हिंदी साहित्य में 150 सालों से काम कर रही संस्था हिंदी साहित्य सम्मेलन प्रयाग की तरफ से उन्हें साहित्य महा महो उपाध्याय की डिग्री से भी सम्मानित किया जा चुका है।

विदेशों में भी छपे जनरल
डॉ. बेदी का ज्ञान मात्र भारत ही नहीं, विदेशों को भी प्राप्त हुआ। उनके 16 शोधपत्र विदेशी जनरलों में भी छप चुके हैं। इसके अलावा भारत में छपने वाला कोई भी ऐसा जनरल नहीं बचा, जिसमें उनके शोध पत्र को जगह न मिली हो। अपने जीवन काल में उन्होंने कनाडा, डेनमार्क, नार्वे, पाकिस्तान, भुटान और सिंगापुर में भी अपने शोधपत्र पढ़े। भारत में 200 से अधिक शोधपत्र वह पढ़ चुके हैं। इसके अलावा अभी तक वह 40 बच्चों को पीएचडी और 60 स्टूडेंट्स को एमफिल के शोध करवा चुके हैं।