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गोल्डन टेंपल कीर्तन में नहीं सुनेगा हारमोनियम:अकाल तख्त जत्थेदार के आदेश के बाद हटाया जा रहा, बोले- यह अंग्रेजों का दिया 'साज'

अमृतसर4 महीने पहले
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गोल्डन टेंपल में कीर्तन करते हुए रागी जत्था। - Dainik Bhaskar
गोल्डन टेंपल में कीर्तन करते हुए रागी जत्था।

आने वाले तीन सालों में गोल्डन टेंपल के अंदर धीरे-धीरे हारमोनियम की आवाज खत्म होती जाएगी। तीन सालों के बाद गोल्डन टेंपल में रागी जत्थे हारमोनियम का इस्तेमाल पूरी तरह से बंद कर देंगे। श्री अकाल तख्त साहिब के जत्थेदार ज्ञानी हरप्रीत सिंह के आदेशों के बाद अब शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (SGPC) ने भी इस आदेश को लागू करने का फैसला कर लिया है।

गोल्डन टेंपल में रागी जत्था हारमोनियम का प्रयोग करते हुए।
गोल्डन टेंपल में रागी जत्था हारमोनियम का प्रयोग करते हुए।

जत्थेदार ज्ञानी हरप्रीत सिंह और SGPC के प्रधान एडवोकेट एचएस धामी का कहना है कि हारमोनियम कभी गुरुओं की तरफ से प्रयोग किया जाने वाला यंत्र था ही नहीं। भारत में हारमोनियम अंग्रेजों की तरफ से दिया गया यंत्र है। अंग्रेजी राज के समय हारमोनियम को भारत लाया गया और सन 1901 वे साल था जब पहली बार गोल्डन टेंपल के अंदर रागी जत्थों ने हारमोनियम का प्रयोग शुरू किया था। 122 सालों के बाद हारमोनियम का इस्तेमाल बंद करने का फैसला किया गया है और 125 सालों के बाद इसे पूरी तरह से बंद कर दिया जाएगा।

धीरे-धीरे इसका प्रयोग होगा कम

मिली जानकारी के अनुसार SGPC हारमोनियम का प्रयोग एक दम से बंद नहीं करेगी। इसे धीरे-धीरे हटाया जाएगा। गोल्डन टेंपल के अंदर कीर्तन करने वाले जत्थे धीरे-धीरे इसके प्रयोग को बंद करेंगे, ताकि रोज आने वाले श्रद्धालु भी इस बदलाव में अपने आप को ढाल सकें। इसकी जगह अब सिर्फ पुरातन तारों वाले यंत्रों का ही प्रयोग किया जाएगा।

1842 में हुई थी इसकी खोज

1842 में एक फ्रांसीसी आविष्कारक अलेक्जेंड्रे डेबैन ने सबसे पहले हारमोनियम के डिजाइन काे पेटेंट कराया था। यह यंत्र 19वीं शताब्दी के अंत में भारत लाया गया था और 1901 में पहली बार रागी जत्थों ने इसका प्रयोग गोल्डन टेंपल में कीर्तन करने में किया।

ट्रेनिंग भी हो चुकी है शुरू

गोल्डन टेंपल के अंदर कीर्तन करने वाले 15 जत्थे हैं, जो दिन के 24 घंटे में से 20 घंटे कीर्तन करते हैं। यह जत्थे दिन व मौसम के अनुसार 31 मुख्य रागों में से एक-एक राग चुनते हैं और उनका गायन करते हैं। इनमें से 5 जत्थे ऐसे हैं, जो हारमोनियम के बिना कीर्तन करना जानते हैं। ये जत्थे रबाब और सारंदा जैसे वाद्ययंत्रों का प्रयोग करते हैं। अन्य की ट्रेनिंग भी शुरू हो चुकी है। अगले तीन सालों में यह सभी जत्थे बिना हारमोनियम के कीर्तन करने में निपुण हो जाएंगे।

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