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हिंदी दिवस पर विशेष:पंजाब की भूमि, हिंदी भाषा और हिंदी साहित्य की जननी: एचएस बेदी

अमृतसर6 दिन पहले
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  • सरकारी प्रयासों से ज्यादा युवा वर्ग की नई सोच से आगे बढ़ेगी हिंदी, विश्व के 253 देशों की यूनिवर्सिटी में तीसरा व्यक्ति हिंदी-भाषी

हिमाचल प्रदेश में सेंट्रल यूनिवर्सिटी के चांसलर एवं जीएनडीयू अमृतसर में हिंदी विभाग के प्रमुख रहे डॉ. एचएस बेदी के मुताबिक पंजाब की भूमि हिंदी भाषा और हिंदी साहित्य की जननी है। एक सेमिनार में उन्होंने खुलासा किया था कि हिंदी भाषा और साहित्य का सृजन 10वीं सदी में अविभाजित पंजाब के माझा क्षेत्र लाहौर के कवि चंदबरदाई के महाकाव्य के साथ ‘पृथ्वीराज रासो’ की रचना से हुआ था। विश्व के 253 देशों की यूनिवर्सिटी में हिंदी विषय की पढ़ाई होने के कारण हर तीसरा व्यक्ति हिंदी-भाषी है। डॉ. बेदी ने फिल्लौर निवासी पं. श्रद्धाराम फिल्लौरी पर भी गहन शोध किया। बेदी के मुताबिक प्रकांड विद्वान श्रद्धाराम फिल्लौरी ने 1870 के आसपास 140 वर्ष पहले एक भजन ‘ओम जय जगदीश हरे...’ की रचना की, जिसे देश-दुनिया में प्रमुख आरती के रूप में गाया जाता है।

‘सृष्टि की चादर और गुरु तेग बहादुर’ पर लिखी पुस्तकें हिंदी प्रेमियों के लिए गौरव का विषय

बेदी के मुताबिक करीब 10 साल पहले आकाशवाणी जालंधर में प्रोग्राम एक्जिक्यूटिव रहे तपन बनर्जी रिटायरमेंट के बाद से छत्तीसगढ़ में हैं। उन्होंने साल 2004 में ‘सृष्टि की चादर, गुरु तेग बहादुर’ पुस्तक लिखी थीं। शायद हिंदी में गुरु साहिबान पर यह हिंदी की पहली पुस्तक किसी बंगाली लेखक की ओर से लिखा जाना हिंदी प्रेमियों के लिए गौरव का विषय है।

बकौल बनर्जी हिंदी का विस्तार केवल सरकारी प्रयासों से नहीं, बल्कि जनता की सोच और ताकत से ही संभव है। वह मानते हैं कि भाषा के प्रचार-प्रसार में हिंदी समाचार पत्रों और फिल्मों ने अहम भूमिका निभाई है। 25 साल पहले हिंदी में पीएचडी करने वाली शहर के रामगढ़िया गर्ल्स कॉलेज की पूर्व प्रिंसिपल डॉ. नरिंदर कौर संधू इस भाषा की सेवा में प्रमुख भूमिका निभा रही हैं।

पंजाब को केवल पंजाबी भाषाई राज्य मान लेना गलत, साहिर लुधियानवी के गीत खूब चर्चित

डॉ. संधू बेबाकी से मानती हैं कि ट्रेडिशनल सोसायटी में भाषाई बंधनों के बीच हिंदी में डॉक्ट्रेट करना सामाजिक चुनौती रही है। रिटायरमेंट के बाद भी डॉ. संधू पंजाब यूनिवर्सिटी और पीटीयू के जोनल मुकाबलों में जज की भूमिका निभाती हैं। संधू को युवाओं से उम्मीदें हैं, जो नई सोच के साथ भाषाई बंधनों को तोड़कर सीखने की ललक रखता है।

माहिरों की मानें तो पंजाब को केवल पंजाबी भाषाई राज्य मान लेना गलत है। इसी सूबे में साहित्यकार एस. तरसेम अच्छे आलोचक रहे हैं। कृष्णा सोबती की भी हिंदी में अच्छी दखल रही है। नामवर शायर साहिर लुधियानवी के गीतों में हिंदी का खूबसूरती से प्रयोग रहा और चर्चित रहे। बादशाह अकबर अविभाजित पंजाब के लाहौर में जन्मे थे, उनकी रचनाओं में हिंदी आधारित शृंगार, नीति और भक्ति रहा है।

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