अमृतसर में मजदूरों की शॉर्टेज / 20 हजार 200 उद्योगों में से 7 हजार ही शुरू हो पाए, प्रोडक्शन सिर्फ 25 फीसदी

फाइल फोटो फाइल फोटो
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  • सप्लाई चेन बहाल न होने से डिमांड कम, मगर उसके लिए भी कच्चा माल पर्याप्त नहीं
  • 25 से 30 फीसदी कैपेसिटी के साथ काम कर रहे हैं उद्दयोग धंधे

दैनिक भास्कर

May 23, 2020, 05:30 AM IST

अमृतसर. कोरोना वायरस से बचाव के लिए जारी लॉकडाउन में इजाजत मिलने के बावजूद जिले के सिर्फ 35 फीसदी इंडस्ट्रियल यूनिट ही खुल पाए हैं। वहीं लेबर शॉर्टेज, डिमांड नहीं होने और कच्चे माल की आपूर्ति नहीं होने की वजह से बाकी के 65 फीसदी यूनिटों ने अपनी मशीनें शुरू नहीं करवाई है। जिले के 20200 यूनिटों में से सिर्फ 7 हजार के करीब यूनिट ही फिलहाल 25 से 30 फीसदी कैपेसिटी के साथ काम कर रहे हैं। दूसरी तरफ इंडस्ट्रियलिस्ट का कहना है कि 23 मई को केंद्रीय वित्त मंत्री की तरफ से एमएसएमई को लोन सुविधा देने की जो घोषणाएं की गईं थी, उसका फायदा लेने जाओ तो बैंक कोई भी लिखित गाइडलाइंस नहीं आने का हवाला देते हैं।

इंडस्ट्री को मिल पा रहे सिर्फ 35% लेबर

फोकल प्वाइंट इंडस्ट्रीज एसोसिएशन के चेयरमैन कमल डालमिया ने बताया कि इंडस्टी में सिर्फ 30-35 फीसदी लेबर आ रही है। बाकी बची 65% में से ज्यादातर या तो रजिस्ट्रेशन करवाकर जा चुके हैं। जो रह गए वो जिला प्रशासन की कॉल के इंतजार में क्वार्टरों में ही बैठे हैं। फिलहाल लोकल लेवल की लेबर ही आ रही है। केंद्रीय वित्त मंत्री की तरफ से घोषित लोन सुविधाओं के लिए बैंक वाले अभी भी नोटिफिकेशन का इंतजार कर रहे हैं। लेबर शॉर्टेज और डिमांड न होने की वजह से फोकल प्वाइंट में 50 फीसदी से ज्यादा कारखाने बंद हैं।

मार्केट और ट्रांसपोर्ट पूरी तरह से चलें तो सप्लाई लाइन बनेगी

लघु उद्योग भारती अमृतसर के प्रेसिडेंट अमित कपूर ने बताया कि जिला के प्रोसेसिंग यूनिट व निटिंग यूनिट एक-दूसरे पर डिपेंड है। इनसे जुड़ी बाहरी स्टेटों की मार्केट अभी तक पूरी तरह से नहीं खुली है। इंडस्ट्री चलाते हैं तो खर्चे तो ज्यादा पड़ेंगे। ऐसे में 65%  इंडस्ट्रियलिस्ट यूनिट नहीं खोल रहे हैं। मार्केट-ट्रांसपोर्ट पूरी तरह से खुलने पर ही तक सप्लाई लाइन बहाल हो पाएगी। बाहरी राज्यों से कच्चा माल भी नहीं आ रहा है।

24 घंटे चलने वाली फैक्टरियों में 5-6 घंटे वर्किंग हो रही

न्यू फोकल प्वाइंट इंडस्ट्री एसोसिएशन के प्रधान धीरज ककड़िया ने बताया कि ज्यादातर इंडस्ट्रियल लेबर ट्रेनों या ट्रकों से चली गई है। वहीं रॉ मैटीरियल भी नहीं आ रहा और आगे माल की डिमांड नहीं मिल रही। जिसकी वजह से जो इंडस्ट्री 24 घंटे चलती थी, वो मात्र 5-6 घंटे ही चल पा रही। ज्यादातर फैक्टरियां सिर्फ लेबर का खर्च निकालने के लिए ही थोड़ी बहुत मेनुफेक्चरिंग कर रही हैं। दिल्ली, महाराष्ट्र, कोलकाता व दूसरें राज्यों में सप्लाई होने वाले सामान की अभी डिमांड ही नहीं आ रही है।

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