तस्वीरों में देखिए, लंगूरों का अनोखा मेला:दुनिया का इकलौता मंदिर जहां बैठी मुद्रा में हैं हनुमान; जिससे लव-कुश ने बांधा था वो पेड़ भी मौजूद; संतान सुख की मन्नत होती है पूरी

अमृतसर2 महीने पहले

शारदीय नवरात्रि चल रहे हैं और इस मौके पर हम आपको एक ऐसा मेला तस्वीरों में दिखाने जा रहे हैं, जो लंगूरों के मेले के नाम से प्रसिद्ध है। यह नवरात्रि मेले की तरह 10 दिन लगता है। अमृतसर के दुर्ग्याणा मंदिर के पास बड़े हनुमान मंदिर में दूर दराज से लोग बच्चों को लंगूर के रूप में सजाकर लाते हैं।

बड़ा हुनमान मंदिर, जहां इस तरह बैठी मुद्रा में हैं हनुमान जी।
बड़ा हुनमान मंदिर, जहां इस तरह बैठी मुद्रा में हैं हनुमान जी।

चांदी के रंग का गोटा लगी लाल रंग की पोशाक और शंकाकार टोपी पहनकर लंगूर बने बच्‍चे और युवक लोगों को आकर्षित करते हैं। बड़ा हनुमान मंदिर विश्‍व का इकलौता मंदिर है, जहां हनुमान जी बैठी हुई मुद्रा में हैं।

मंदिर को लेकर मान्यता है कि लोग यहां संतान को लेकर मन्नत मांगते हैं। जिसके पूरा होने के बाद वो बच्चे को लंगूर की तरह सजाकर इस मेले में लेकर आते हैं। इसके बाद उसे हनुमान जी की वानर सेना में शामिल किया जाता है। कहा जाता है कि यह प्रथा रामायण काल से चली आ रही है। इस जगह को श्री राम का वरदान मिला हुआ है।

ढोल की थाप पर थिरकते हुए मन्नत पूरी करने पहुंचते श्रद्धालु।
ढोल की थाप पर थिरकते हुए मन्नत पूरी करने पहुंचते श्रद्धालु।

10 दिन तक चलता है मेला
मान्यता के अनुसार, ढोल की थाप पर उल्लास मनाते हुए लोग मन्नत पूरी करने आते हैं। पूजा विधि के अनुसार कपड़े उतार कर बच्चों को भगवान हनुमान का चोला पहनाते हैं। बच्चे अगले 10 दिन विजयादशमी तक सुबह और शाम दो बार रोजाना मंदिर में मत्था टेकते हैं। इस तरह मंदिर में 10 दिन लंगूरों का मेला लगता है।

ब्रह्मचर्य व्रत का होता है पालन
मेले में नवजात शिशु से लेकर नौजवान तक लंगूर बनते हैं। बच्चे और माता-पिता सभी इस दौरान पूरे 10 दिनों तक ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करने के साथ-साथ पूरे सात्विक जीवन को भी व्यतीत करते हैं। वो फलाहार करते हैं, जमीन पर सोते हैं और नंगे पांव रहते हैं। 10 दिनों के इस व्रत का अंत दशहरे वाले दिन होता है और अगले दिन दोबारा सभी बड़ा हनुमान मंदिर पहुंचकर चोला उतारते हैं और स्नान करते हैं।

एक बुजुर्ग, अपने पोते को लंगूर बनाकर लेकर पहुंचे।
एक बुजुर्ग, अपने पोते को लंगूर बनाकर लेकर पहुंचे।

मान्यता: मन्नत मांगने से भरती है सूनी गोद
मान्यता है कि जो कोई भी इस हनुमान मंदिर में संतान सुख की मन्नत मांगता है, वह पूरी हो जाती है। मन्नत पूरी होने पर वह व्यक्ति मेले में लंगूर का बाना पहनकर हर रोज सुबह-शाम मत्था टेकने के लिए आता है। इसी तरह बच्चों को लंगूर बनाकर लाते हैं।

क्या है इस मेले के पीछे की कहानी
इसी मंदिर में एक वट का वृक्ष भी मौजूद है। जब राम जी की सेना के साथ लव-कुश का युद्ध हुआ था, तो हनुमान जी को इसी वृक्ष से बांधा गया था। बताया जाता है कि अश्वमेध यज्ञ से छोड़े गए घोड़ों को लव-कुश ने पकड़ लिया था, जब हनुमान जी उसे छुड़वाने पहुंचे तो उन्हें लव और कुश ने पेड़ से बांध दिया था।

इसके बाद राम जी यहां उन्हें छुड़ाने पहुंचे थे। उनका लव-कुश से युद्ध हुआ। जिसे सीता जी ने बीच में आकर रोका था। उन्होंने राम जी को बताया कि ये आपके ही बच्चे हैं। यहां पर भगवान राम को उनकी संतानों से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था, इसीलिए माना जाता है कि यहां पर जो भी संतान की कामना करता है तो वो जरूर पूरी होती है।

एक शख्स खुद भी लंगूर बना और बेटे को भी लंगूर बनाकर लाया।
एक शख्स खुद भी लंगूर बना और बेटे को भी लंगूर बनाकर लाया।

हवाई, सड़क और रेल मार्ग से जुड़ा हुआ है अमृतसर
देश के हर कोने से रेल और सड़क मार्ग के माध्यम से अमृतसर पहुंचा जा सकता है। रोजाना दिल्ली से अमृतसर के लिए ट्रेनें और बसें चलती हैं। वहीं देश के बड़े शहर हवाई मार्ग के रास्ते अमृतसर से जुड़े हुए हैं। अमृतसर में श्री गुरु रामदास जी इंटरनेशनल हवाई अड्‌डा है, जहां विदेशों से भी लोग डायरेक्ट फ्लाइट लेकर पहुंच सकते हैं।

-रेलवे स्टेशन से दुर्ग्याणा मंदिर 1.90 किलोमीटर दूर है।

-एयरपोर्ट से दुर्ग्याणा मंदिर की दूरी 12.4 किलोमीटर है।

-बस स्टैंड से दुर्ग्याणा मंदिर की दूरी 2.6 किलोमीटर है।

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