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  • With 7 Years Of Hard Work, GNDU Digitized 2300 Handwritten Religious Texts, Including 550 In The Form Of Guru Granth Sahib.

श्री गुरु ग्रंथ साहिब का पहला प्रकाश पर्व आज:7 साल की मेहनत से जीएनडीयू ने डिजिटाइज्ड किए 2300 हस्त लिखित धार्मिक ग्रंथ, इनमें 550 गुरु ग्रंथ साहिब के स्वरूप भी

अमृतसर18 दिन पहलेलेखक: हरजिंदर सिंह
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सात साल की कड़ी मेहनत से गुरु नानक देव यूनिवर्सिटी ने सिख गुरु साहिबानों और संत महापुरुषों के हस्त लिखित 2300 सिख धार्मिक ग्रंथों काे डिजिटाइज्ड किया। इनमें 550 गुरु ग्रंथ साहिब के स्वरूप भी शामिल हैं। 7 सितंबर मंगलवार को गुरु ग्रंथ साहिब का पहला प्रकाश पर्व मनाया जाएगा। जीएनडीयू की गुरु ग्रंथ साहिब अध्ययन केंद्र के मुखी प्राे. अमरजीत सिंह ने बताया कि गुरु नानक देव की ओर से रची गई बाणी काे भाई सैदाे, भाई हंसू तथा भाई सीहां जी ने संपादित किया।

1604 में पहली बार दिया ग्रंथ साहिब का दर्जा
1604 में 5वें सिख गुरु गुरु अर्जन देव ने पहली बार गुरु ग्रंथ साहिब (आदि ग्रंथ) काे संपादित कर गुरु ग्रंथ साहिब का दर्जा दिया। 1708 में दसवें सिख गुरु गोबिंद सिंह ने गुरु ग्रंथ साहिब काे गुरुगद्दी साैंप दी। उन्होंने कहा कि सिख गुरुओं, संत महापुरुषों के लिखित प्राचीन ग्रंथ, श्रद्धालुओं के घराें, उदासी तथा संप्रदाय के डेराें, चीफ खालसा दीवान तथा एसजीपीसी से हासिल किए गए।

2014 में शुरू हुआ था डिजिटाइजेशन प्रोजेक्ट
धार्मिक ग्रंथों काे डिजिटाइज्ड करने का प्रोजेक्ट जीएनडीयू में 2014 में तत्कालीन डायरेक्टर प्राे. बलवंत सिंह ढिल्लों ने प्राे. अमर सिंह काे साैंपा था प्रोजेक्ट काे मौजूदा डायरेक्टर प्राे. अमरजीत सिंह की टीम ने पूरा किया। उन्होंने कहा कि हस्त लिखित पावन स्वरूपों तथा धार्मिक ग्रंथों काे पंजाब, दिल्ली, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, उतराखंड, बिहार, राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र से हासिल किया।

175 पावन स्वरूपों पर बरस-सम्वत लिखा, कई ग्रंथों पर गुरु साहिब के मूल मंत्र के रूप में हस्ताक्षर
डिजिटाइज्ड ग्रंथों में 550 गुरु ग्रंथ साहिब, 70 दशम ग्रंथ, गुरबाणी की 500 पाेथियाें के अलावा 1200 दुर्लभ पुस्तकें शामिल हैं। गुरु ग्रंथ साहिब के 175 पावन स्वरूप एेसे हैं जिनके ऊपर बरस-संवत लिखा है जिससे उनकी प्रमाणिकता साबित हाेती है। कई ग्रंथों पर गुरु साहिब ने मूल मंतर के रूप में हस्ताक्षर दर्ज हैं। 20 खरड़े गुरु अर्जुन देव जी, गुरु हरिराय जी, गुरु तेग बहादुर जी तथा गुरु गोबिंद सिंह जी के लिखे हुए हैं।

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