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त्योहार:बदलते युग ने बदल डाली लोहड़ी के त्योहार की रीत, अब नहीं सुनाई देते गलियों में लोहड़ी के गीत

रविंदर शर्मा/ दीपक गर्ग | बरनाला15 दिन पहले
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  • बदल रही संस्कृति, पश्चमी सभ्यता की तरह एक-दूसरे को गिफ्ट देकर मनाए जाते हैं त्योहार

सुंदर मुंदरिये तेरा कौन विचारा दुल्ला भट्टी वाला, लोहड़ी वी लोहड़ी तेरा मुंडा चढ़ेया घोड़ी अब गलियों में सुनाई नहीं देते। करीब दो दशक पहले लोहड़ी से कई दिन पहले गलियों में ऐसे गीत सुनाई देते थे जो बच्चे जोर-जोर से गाते थे। बदलते वक्त के साथ लोहड़ी के त्योहार को मनाने का तरीका भी बदल गया है। लोहड़ी पर कई दिन पहले तैयारी करने की बजाए अब उन लोग बाजारों में आए आकर्षक गिफ्ट आइटम्स अपने दोस्तों- मित्रों, साथियों को देते हैं।

एसएस सुपर स्टोर के मालिक मनीष मिंटा ने बताया कि इन दिनों बाजार में लोहड़ी के आकर्षक गिफ्ट्स आए हुए हैं। जिसमें ड्राई फ्रूट गचक, स्पेशल इरानी नोट्स गचक, गुजराती रेवड़ी, तिल वाली पिन्नी, चॉकलेटी नट्स आदि विशेष रूप से लोहड़ी के लिए तैयार किए गए गिफ्ट है। जिनकी भारी डिमांड चल रही है।

इस बार कोविड़-19 के बाद लोहड़ी ऐसा पहला त्योहार आया है। जिसमें कोविड-19 का प्रभाव समाज में थोड़ा कम हुआ है। दिवाली के समय भी कोविड-19 का प्रभाव बहुत ज्यादा था। इसलिए लोगों ने खुलकर दिवाली पर एक दूसरे को गिफ्ट नहीं दिए थे। इसलिए लोग लोहड़ी पर बड़े स्तर पर खरीदारी कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि बाजार में इन दिनों गिफ्ट आइटम की भारी डिमांड है।

20 दिन पहले गूंजने लग जाते थे लोहड़ी के गीत
अकाली नेता व समाजसेवी राजीव वर्मा रिंपी ने कहा कि करीब 30 साल पहले लोहड़ी पर 20 दिन पहले गलियों में गीत गूंजने लग जाते थे। वह और उनके जैसे सभी बच्चे इकट्ठे होकर घर-घर से लोड़ी मांगते थे। लोग उन्हें लकड़ियां व पाथी आदि देते थे, जो वह एक जगह इकट्ठे करते थे और लोहड़ी वाले दिन इकट्ठे होकर जलाते थे। लोहड़ी का जश्नन मनाते थे, लेकिन अब इस त्योहार का रूप पूरी तरह से बदल गया है। ़

हर त्योहार का हो रहा बाजारीकरण : डॉ. औलख
सिविल अस्पताल तपा के एसएमओ जसवीर औलख ने कहा कि हर त्योहार की हमारे समाज में विशेष महत्व था, लेकिन अब दिवाली, लोहड़ी, क्रिसमिस, राखी आदि सभी त्योहारों का बाजारी करण हो रहा है। बहुराष्ट्रीय कंपनियां अपने ब्रांड के बने प्रोडक्ट त्योहारों से जोड़कर लोगों को आकर्षित करते हैं और लोग भी गिफ्ट देने को ही त्योहार मनाना समझते हैं। इसलिए हमारे त्यौहार अपनी सभ्यता खोते जा रहे हैं जो बेहद चिंताजनक है।

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