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नो कैशलेस का खेल:मोगा में 52 हजार आयुष्मान कार्डधारी, पर 3 माह में योजना के अधीन कोरोना मरीज का नहीं हुआ इलाज

मोगाएक महीने पहलेलेखक: हरबिंदर सिंह भूपाल
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पंजाब में चल रही कैशलेस स्कीम। - Dainik Bhaskar
पंजाब में चल रही कैशलेस स्कीम।
  • आयुष्मान कार्ड लेकर इलाज कराने जाने वालों से कहा जाता है - बेड खाली नहीं; कैश देने पर कर लिया जाता है एडमिट

जिले के 380 गावों में करीब 100 आरएमपी डाॅक्टर हैं, जो जिले के बड़े 125 नर्सिंग होमों से अटैच हैं। इन आरएमपी पर ग्रामीणों का इतना विश्वास है कि वे इन आरएमपी के कहने पर शहर के अस्पतालों में जाते हैं या पहुंचाए जाते हैं। लोग अपनी मर्जी से अस्पताल या डाॅक्टर को नहीं चुनते। उस समय उनके सामने जीवन-मृत्यु का सवाल जो खड़ा कर दिया जाता और अब कोविड में यह खेल और भी बढ़िया चल रहा है।

यही कारण है कि सिविल में कोई कोरोना मरीज नहीं है, सबके सब बाहर निजी अस्पतालों में दाखिल हैं। जिला प्रशासन की ओर से जारी 52000 आयुष्मान सेहत कार्ड धारकों में से एक भी कोरोना मरीज न तो सिविल में दाखिल है और न ही किसी निजी अस्पताल में। लोगों का कहना है कि उन्हें तो रेफर कर दिया जाता है, वह कार्ड-वार्ड सब भूल गए हैं। जो लोग कार्ड लेकर पहुंचे भी निजी अस्पतालों ने कहा बेड नहीं है। इस प्रकार कैशलेस को भूल कर कैश का खेला जारी है।

लोग बोले-गांव का डाॅक्टर कोरोना की पहले ही बना देता है दहशत, फिर शहर में जिस अस्पताल से उसका संबंध होता हैं, वहां कर देता है रेफर

सेहत विभाग के सूत्रों अनुसार जिले के 4 से 5 गांवों के लिए लंबे समय से एक आरएमपी डाॅक्टर सेहत सेवाएं दे रहा है। ऐसे में 380 गावों के लिए और शहरों व कस्बों की गरीब बस्तियों के लिए ऐसे डाक्टरों को मिला लें तो इनकी संख्या 100 के करीब बनती है। ग्रामीण सर दर्द से लेकर हर बिमारी का इलाज इनसे कराते हैं। इन डाॅक्टरों ने शहर के बड़े अस्पतालों से सांझ बनाई है और जब कोई मरीज गंभीर हो जाता है तो उसे शहर के अस्पताल भेज दिया जाता है। यह परंपरा पिछले 5 दशकों से चली आ रही है।

ऐसे समझें नकद लेकर इलाज करने का खेल

केस-1 मोगा के महिंदर सिंह ने बताया कि वह पहले एक निजी अस्पताल में सांस में तकलीफ होने की समस्या को लेकर गया तो उन्होंने जांच के बाद कोविड के लक्षण बताए। वह उसको दाखिल करने व बेड देने की तैयारी कर रहे थे। जब उसने बताया कि उसके पास आयुष्मान कार्ड है तो पहले वे बोले वह तो रजिस्टर्ड नहीं। फिर कहा बेड खाली नहीं। उसने कहा वह घर लौट आया और सिविल अस्पताल के सहयोग से घर में आइसोलेट होकर इलाज कराकर ठीक हो गया।

केस-2 कस्बा कोटइसेखां की ममता ने बताया कि उसके पति कोविड का शिकार हो गए। हमारे पास आयुष्मान कार्ड है। परंतु उसके पति को कार्ड के नाम पर किसी निजी अस्पताल ने दाखिल नहीं किया गया। उन्होंने कहा कैश है तो बेड है।

केस-3 ग्रामीणों से जब बात की तो वे बोले उनका डाॅक्टर उनके लिए रब्ब है। उन्होंने कहा कि कोविड से मरना नहीं। जैसा डाॅक्टर कहेगा हम करेंगे। हम कार्ड को भूल गए हैं।

अस्पताल वाले ये दिक्कत बता रहे... याेजना में कम पैसे निर्धारित किए गए हैं, वह भी माह बाद मिलते हैं

एक मल्टीपल फेसिलिटी देने वाले अस्पताल के प्रबंधक ने नाम नहीं छापने की शर्त पर बताया कि कोरोना के बढ़ रहे मामलों में बेड की पहले से दिक्कतें तो हैं, परंतु कैशलेस सेवाएं वह इसलिए नहीं दे पा रहे कि इस समय कोविड के इलाज के खर्चे बढ़ गए हैं। कैशलेस कार्ड में फिक्स व कम पैसे निर्धारित किए गए हैं। हर सेवा के अलग-अलग पैकेज बनाए गए हैं, जो बहुत कम हैं और अस्पतालों को वह पैसा भी महीना या दो महीने बाद मिलता है। इसलिए कैश काे पहल देते हैं।

ऐसे अस्पतालों पर होगी कार्रवाई, लोग हमें दें शिकायत : सीएमओ

सीएमओ अमरप्रीत कौर बाजवा का कहना है कि जिन लोगों के पास आयुष्मान कार्ड है, उनको सहुलियत मिलनी चाहिए। कोविड मरीजों को कार्ड पर इलाज कराने की सहूलियत है। अगर उनको किसी निजी अस्पताल जो आयुष्मान स्कीम तहत लिस्टेड है, इलाज करने से इनकार करता है तो उनको शिकायत दी जाए। तुरंत कार्रवाई होगी।

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