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हकीकत में पर्याप्त सेहत सुविधाओं का अभाव:जिला अस्पताल में चेस्ट स्पेशलिस्ट व सर्जन की पोस्ट खाली ब्लैक फंगस में जरूरी एम्फोटेरिसिन-बी इंजेक्शन है ही नहीं

मोगा19 दिन पहलेलेखक: हरबिंदर सिंह भूपाल
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मोगा के निजी अस्पताल में मरीज की फर्स्टएड करती सेहतकर्मी। - Dainik Bhaskar
मोगा के निजी अस्पताल में मरीज की फर्स्टएड करती सेहतकर्मी।
  • कोरोना की संभावित तीसरी लहर से लड़ने की तैयारियों की हो रहीं बातें

एक तरफ हम कोरोना की तीसरी लहर से लड़ने की तैयारियों की बात कर रहे हैं, वहीं कोरोना के इलाज के लिए सबसे जरुरी चेस्ट स्पेशलिस्ट डॉक्टर की सिविल अस्पताल में पोस्ट दो सालों से खाली पड़ी है। वहीं नवंबर 2020 से सर्जन का पद भी रिक्त चला आ रहा है। ऐसे में सिविल अस्पताल एक रेफरल अस्पताल बन कर रह गया है। वहीं जिले में ब्लैक फंगस ने भी पैर पसारना शुरू कर दिया है। अभी तक 2 केस सामने आ चुके हैं, लेकिन दोनों को पीजीआई चंडीगढ़ रेफर करना पड़ा था। जिले में बढ़ते ब्लैक फंगस के मरीजों के लिए स्वास्थ्य विभाग की तैयारियां फिलहाल अधूरी हैं, जिले में ब्लैक फंगस का आखिरी केस 23 मई को आया था।

जिला मुख्यालय पर जरूरी दवाइयों और इंजेक्शन की उपलब्धता और विशेषज्ञ डाक्टरों की भी कमी है। जांच के संसाधन भी नहीं हैं। शहर में भी एम्फोटेरिसिन B इंजेक्शन का टोटा है। मेडिसिन व्यापारी विमल जैन ने बताया कि कंपनियों में इंजेक्शन का उत्पादन कम होने से सप्लाई रुक गई है। इंजेक्शन कंपनियों से जुड़े लोगों से चर्चा में पता चला है कि इस इंजेक्शन का रा-मटेरियल जर्मनी से आता है, जो कंपनियों तक नहीं पहुंच पा रही है। वहीं मोगा के मेडिसिन के होल सेल व्यापारी राजीव गर्ग का कहना है कि एकदम डिमांड बढ़ने से इसकी प्रोडक्शन में प्राबलम होने से कमी है। इसलिए सरकार ने नई गाइडलाइन्स बनाई है कि जिस अस्पताल को यह इन्जेक्शन चाहिए वह संबंधित सिविल सर्जन से संपर्क करेगा और सिविल सर्जन इसकी उपलब्धता करवाएगा। इस प्रक्रिया में मरीज के इलाज में देरी हो सकती है, जो उसके जीवन के लिए घातक हो सकती है। यही वजह है कि इन इंजेक्शनों की किल्लत हो रही है। बाजार में इनकी कीमत 6 से 7 हजार रुपए तक पहुंच गई है। मोगा के 100 से 125 मेडिकल स्टोर्स के अलावा 60 रिटेल व्यापारियों के पास भी यह इंजेक्शन नहीं है।

ब्लैग फंगस की तैयारियों में ये तीन कमियां

1 . दवाइयों की कमी, अभी कोई वार्ड नहीं बनाया गया

ब्लैक फंगस के इलाज के लिए एंटी फंगल दवाइयों के साथ एम्फोटेरिसिन-बी इंजेक्शन सबसे महत्वपूर्ण है, लेकिन मोगा के जिला अस्पताल में यह इंजेक्शन नहीं है और बाजार में भी इसकी उपलब्धता नहीं है। इसके साथ ही एंटी फंगल दवाइयां भी कम मात्रा में ही हैं। ब्लैक फंगस के मरीजों को भर्ती करने के लिए जिला अस्पताल अभी कोई वार्ड नहीं बनाया गया है। इसका कारण सिविल अस्पताल में सर्जन डॉक्टर का पद खाली रहना है। इससे मरीजों को रेफर करना पड़ता है।

2 . डाॅक्टरों की कमी

ईएनटी स्पेशलिस्ट के 3 पद, पर तैनात 1 ही

ब्लैक फंगस के इलाज में ईएनटी स्पेशलिस्ट की अहम भूमिका है। जिला अस्पताल में पहले ही डॉक्टरों की कमी है। इनमें ईएनटी स्पेशलिस्ट भी शामिल हैं। यहां ईएनटी स्पेशलिस्ट के तीन पद स्वीकृत हैं, लेकिन एक ही डॉक्टर है। वहीं सर्जन डॉक्टर की कमी इसका मुख्य कारण है। यही वजह है अभी तक ब्लैक फंगस के मरीज निजी अस्पतालों में गए और उन्हें वहां से पीजीआई रेफर कर दिया गया।

3 . जांच का अभाव

इंडोस्कोपी मशीन चलाने वाला नहीं

वहीं, तीसरी कमी यह है कि ब्लैक फंगस के लक्षण होने पर नेजल इंडोस्कोपी मशीन से नाक की प्रारंभिक जांच की जाती है। जांच में कुछ निकलता है तो एमआरआई कराना होती है, लेकिन जिला अस्पताल में इंडोस्कोपी मशीन तो है, लेकिन इसको चलाने वाले दोनों डॉक्टरों की प्रमोशन हो जाने से अब इस मशीन को चलाने वाला कोई नहीं है, वहीं एमआरआई मशीन है ही नहीं।

डाॅक्टरों की कमी के बारे में उच्चाधिकारियों को लिख चुके हैं

जिला सतर पर इसका इलाज इसलिए संभव नहीं है क्योंकि नवंबर 2020 से सिविल अस्पताल में सर्जन डॉक्टर का पद खाली चला आ रहा है। वहीं ईएनटी डॉक्टरों की भी कमीं है। 3 में से 2 पद रिक्त हैं। ब्लैक फंगस की जांच के इंडोस्कोपी मशीन है पर उससे संबंधित दोनों डॉक्टरों की प्रमोशन हो चुका है। वहीं, डॉक्टरों की कमी के बारे कई बार उच्चाधिकारियों को लिख चुके हैं।
डाॅ. बराड़ एसएमओ, सिविल अस्पताल मोगा

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