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निगम चुनाव में बदलेगा माहौल:सत्ता में पहले ही नाराजगी के स्वर, अब एनजीओ लगा सकती है वोटों में सेंध!

बठिंडा2 महीने पहले
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  • पहली बार सोशल ग्रुप के उम्मीदवार आजमाएंगे किस्मत

नगर निगम चुनाव में पहली बार कुछ चीजें अलग होती दिख रही हैं। शिअद व भाजपा गठबंधन से बाहर अलग-अलग चुनाव लड़ रहे हैं तथा पार्टियों वार्डों में सर्वे करवा टिकटें वितरण का दावा कर रहीं हैं, लेकिन पहली बार सामाजिक सेवा कार्य करते लोग एक बैनर तले इकट्‌ठा होकर निगम चुनाव में उतर रहे हैं तथा बाकायदा शनिवार को बठिंडा सोशल ग्रुप ने शहर के 8 वार्डों में उम्मीदवारों को उतार दिया है तथा इससे राजनीतिक हलचल जरूर तेज होगी।

ग्रुप के अनुसार शहर के 50 वार्डों में ग्रुप उम्मीदवार उतारेगा तथा अधिकतर लोगों की बैकग्राउंड समाजसेवा की है तथा ग्रुप का मकसद शहर में साफ छवि के लोगों को सामने लाना है। हालांकि ग्रुप के पास राजनीतिक अनुभव नहीं है, लेकिन ग्रुप ने वार्ड नंबर 37 में कांग्रेस नेता इंदरजीत सिंह भाऊ को उतारकर सभी को चौका दिया है। अगले कुछ दिनों में ग्रुप बाकी रहते 42 उम्मीदवारों का एलान करेगा। पहले ही सत्तापक्ष में अंदरखाते वर्कर व नेताओं में नाराजगी के भाव के मध्य दावेदारों के बागी होने के खतरे के बीच एनजीओ का सदस्यों को उतारना राजनीतिक दलों की चिंता बढ़ा सकता है।

बठिंडा सोशल ग्रुप का गठन कुछ माह पहले ही किया गया है। काफी बढ़ी संख्या में एनजीओ चलाते व काम करते लोगों ने एक मंच पर आकर निगम चुनाव लड़ने का एलान किया, लेकिन सत्ता के दबाव में काफी लोग पीछे भी हटे, लेकिन बठिंडा सोशल ग्रुप ने शनिवार को पहले 8 उम्मीदवारों के नाम की घोषणा कर इरादे साफ कर दिए हैं यानी की ग्रुप चुनाव लड़ने से कतई पीछे नहीं हटेगा तथा शहर के सभी 50 वार्डों में उम्मीदवार उतारे जाएंगे।

हालांकि छवि साफ आदि होने की दिक्कत नहीं है, क्योंकि अधिकांश लोग सोशल वर्क से जुड़े हुए हैं तथा उनके पास कोई विशेष राजनीतिक अनुभव नहीं है, लेकिन अगर राजनीतिक दलों में अंदरुनी नाराजगी की बात करें तो इन उम्मीदवारों को मदद मिल सकती है।

बंटे विपक्ष को साध सत्ता में बढ़ेगी कांग्रेस
सत्तापक्ष में बैठी कांग्रेस के विरोध में राजनीतिक दल, बागी व अब ग्रुप के लोग मैदान में आ गए हैं। कांग्रेस के विपक्ष में खड़ा ग्रुप काफी बंटा हुआ नजर आ रहा है। शिअद व भाजपा अलग-अलग चुनाव मैदान में हैं, ऐसे में गठबंधन की ताकत कहीं न कहीं कमजोर हुई है। वोट बंटने से विपक्ष को नुकसान हो सकता है, लेकिन दूसरी तरफ सत्ता के बागी हो रहे लोग नाराज लोगों को उनके साथ ला सकते हैं। वहीं एनजीओ बैकग्राउंड के लोग भी कहीं न कहीं वोटों में सेंधमारी कर सकते हैं।

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