सूर्यास्त के बाद नहीं होते थे अंतिम संस्कार:कोरोना से हार रही जिंदगी, एनजीओ अस्पताल से शव लाकर मध्य रात्रि 12 बजे कर रहे दहन

बठिंडा6 महीने पहले
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समय व भाग्य कभी इतना कठोर व निष्ठुर होंगे कि पूरी मानवजाति को एक समान इसकी सजा भुगतनी होगी, शायद कभी किसी ने भी नहीं सोचा होगा। 23 मार्च 2020 को पहली बार कोरोना लॉकडाउन लगने व 29 अप्रैल को पहली बार शहर में नांदेड़ साहिब से लौटे श्रद्धालुओं में दो कोरोना संक्रमित मरीजों के मिलने के बाद जो दहशत शहर में नजर आई थी, अब करीब वैसे ही हालात एक बारगी फिर बनते नजर आ रहे हैं।

कोरोना के सैकेंड स्ट्रेन के बाद तो मानो हालात कंट्रोल से बाहर होते दिख रहे हैं। अप्रैल के 28 दिनों में ही 8343 केस व 83 मौतों के आंकड़े ने बताया कि दुर्भाग्य कितनी नजदीक से हम इंसानों को देख रहा है। आलम यह है कि कोरोना संक्रमण से प्राण त्याग रहे लोगों के परिजन उनकी रीति अनुसार अंतिम क्रियाएं तक नहीं करने को बाध्य हो चुके हैं।

कुछ दिन पहले बठिंडा के दाना मंडी रामबाग में पहली बार एक ही दिन में 18 चिताएं एक साथ जलीं तो मंगलवार रात को कोरोना संक्रमण ने हमें कैस बौना बना दिया है, नजर आया। सहारा जनसेवा के वर्कर पटियाला से शाम करीब 8 बजे एक कोरोना संक्रमित मृतक की देह लेकर रात करीब 11.15 बजे सीधे बठिंडा स्थित दानामंडी रामबाग पहुंचे। यहां मृतक के करीब 6 परिजनों व संस्था के करीब 7 वर्करों के अलावा कोई दूसरा उपस्थित नहीं था। ना तो इस मौके पर उक्त परिवार कोई अंतिम क्रियाएं पूरी कर पाया तथा ना ही वह अपने परिजन के नजदीक से अंतिम दर्शन कर पाए। नजदीक होते हुए भी कोरोना ने जो दूरियां पैदा की गई हैं, वह कोई नहीं भूल सकता। इसके बाद करीब 12 बजे शव को अग्नि दी गई।

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