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भागवत कथा:कभी-भी कथाव्यास के पीछे बैठकर कथा नहीं सुननी चाहिए : प. भजराम शास्त्री

बठिंडा14 दिन पहले
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  • श्रीमदभागवत महापुराण कथा के दूसरे दिन प. भजराम शास्त्री ने संगत को किया निहाल

बीबीवाला रोड, गली न. 3 ए में श्रीमदभागवत महापुराण कथा के दूसरे दिन प. भजराम शास्त्री ने भागवत कथा कब, किसने, कहां गायी गई, के वारे में विस्तार से बताया। उन्होंने राजा परीक्षित का जन्म, भगवान शुकदेव का जन्म, भगवान शंकर द्वारा माँ पार्वती को अमर कथा सुनाना आदि का वर्णन किया। भगवान शंकर जब मां पार्वती को अमर कथा सुना रहे थे, उस समय व्यास मंच के पीछे अंडे के रूप में शुकदेव जी विराजमान थे और कथा श्रवण कर रहे थे। भोले जी को पता लगने पर वे क्रोधित होकर उनके पीछे त्रिशूल लेकर भागे और कैलाश पर्वत के नीचे बद्रीनाथ धाम में वेदव्यास जी की धर्मपत्नी विटका देवी के गर्भ में प्रवेश कर गए और 12 वर्ष तक उनके गर्भ में ही रहे और बाहर आते ही संन्यास के लिए चले गए। अर्थात कथाव्यास के सन्मुख बैठकर कथा सुनने से ही धर्मलाभ की प्राप्ति होती है, कभी-भी कथाव्यास के पीछे बैठकर कथा नहीं सुननी चाहिए। उन्होंने

अत: नारद जी का महर्षि वेदव्यास जी को ज्ञान देना, अपने पूर्वजन्म का वृतांत व अपने जन्म का उद्देश्य की कथा सुनाकर सभी भगवद्कथा प्रेमी सज्जनों को आनंदित किया। उन्होंने बताया कि भागवत महापुराण सभी ग्रंथों का सार है, इसे मुक्ति ग्रंथ कहा गया है। इसकी कथा सुनना और सुनाना दोनों ही मुक्तिदायक है तथा आत्मा को मुक्ति का मार्ग दिखाती है। भजराम शास्त्री ने समझाया कि यदि कोई व्यक्ति किसी तीसरे व्यक्ति को कथा सुनने के लिए प्रेरित करता है, पहले व्यक्ति को इस बात का भी पूरा फल मिलता है। उन्होंने गुरु विशिष्ट व महर्षि विश्वामित्र के प्रसंग के माध्यम से बताया कि श्रीमदभागवत कथा सुनने का फल सभी पुण्यों, तपस्या व सभी

तीर्थों की यात्रा के फल से भी कहीं बढ़ कर है। भागवत कथा का आयोजन करने तथा सुनने के अनेक लाभ हैं। इसे आयोजित कराने तथा सुनने वाले व्यक्तियों-परिवारों के पितरों को शांति तथा मुक्ति मिलती है। मुकंद लाल, जनकराज, भागीरथ लाल, बृषभान, वरुण गोयल, अरुण गोयल, मोना, यशपाल मितल, अशोक कुमार ने व्यासपीठ पर विराजमान भजराम शास्त्री का माल्यार्पण किया व शाला ओढ़ाकर अभिनंदन किया। महापुराण की आरती के साथ ही पहले दिन की कथा संपन्न हुई, व भक्तों में प्रसाद वितरित किया गया।

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