कमलानंद गिरि ने कहा:जहां भाइयों में प्यार हो, वो घर अयोध्या समान

फरीदकोट2 महीने पहले
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रोज एनक्लेव स्थित श्री महामृत्युंजय महादेव मंदिर में आयोजित प्रवचन कार्यक्रम में प्रवचन करते हुए स्वामी कमलानंद गिरि ने कहा कि जो गरीब, बेसहारा, अनाथ, दरिद्र, मठ, मंदिर, गोशाला, धर्मशाला, अनाथालय, विद्यालय, कुष्ठ आश्रम, वृद्ध आश्रम ऐसी आवश्यकता वाली जगहों पर दान देना जानते हैं उनको दाता या देवता कहा गया है। राक्षस वही है जो केवल रखना जानते हैं।

अधिक समय तक रखने पर हर चीज खराब हो जाती है। इसलिए हर वस्तु का सही सदुपयोग होता रहे, यह बेहद जरूरी है। उन्होंने कहा कि जिसमें भरत जैसा तप, त्याग और निष्काम भाव है, उसको भगवान विशेष प्यार देते हैं व अपनी कृपा का हाथ सदा बनाए रखते हैं। उन्होंने बताया कि भरत और श्रीराम कोई खेल खेलने जाते तो श्री राम जी दौड़े-दौड़े मां सुमित्रा जी के पास आकर अपने भाई भरत की प्रशंसा करते।

ऐसे ही भरत जी मां कौशल्या के पास भारी मन से जाते कि कि मेरा मान बढ़ाने के लिए बड़े भैया राम जी जान-बूझकर खेल में हारने की लीला करते हैं। जिस घर में अयोध्या के जैसा परिवार हो। बड़ा भाई छोटे भाई को सही मार्गदर्शन करे और छोटे भाई बड़े भाई को सत्कार व इज्जत दें तो हमारे अपने हृदय में ही रामराज्य स्थापित हो सकता है। रामराज्य की बात करना बहुत आसान है लेकिन राम राज्य को अपने हृदय में उतार कर उस पर अमल करना कठिन काम है।

अयोध्या का नाम इसीलिए अयोध्या रखा गया कि वहां कोई लड़ाई, झगड़ा या कोई युद्ध कभी भी नहीं होता। राम जी ने वन में जाकर कठोर तपस्या की। लखन जी ने उनकी सेवा से और श्री भरत जी ने अवध में रहकर प्रभु की चरण पादुकाओं की सेवा से बराबर की तपस्या की। पदार्थों के अभाव में तपस्या अपने आप हो जाती है।

छप्पन प्रकार के भोग भिन्न-भिन्न प्रकार के पकवान एवं हजारों दास-दासियों के बीच रहकर सब तरफ से वृत्ति हटाकर परमात्मा के चरणों में लगा कर भजन करना तो भरत जैसे त्यागी पुरुष का ही काम हो सकता है। मनुष्य को अपने जीवन को अनुकरणीय बनाना चाहिए ताकि लोग मरणोपरांत भी याद रखें। कभी अपनी मर्यादाओं का उल्लंघन न करें।

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