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समस्या:वाया नदी दो पंचायतों के बीच बनी है विभाजन रेखा रस्सी सेे पीपा सेट को खींच ग्रामीण होते हैं आर-पार

हाजीपुर2 महीने पहले
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  • परेशानी }भगवानपुर के हरवंशपुर बांथू व कटरमाला पंचायत के लोग आजादी पूर्व से झेल रहे कुव्यवस्था का दंश

(राहुल कुमार सिंह) भगवानपुर के हरवंशपुर बांथू व गोरौल प्रखंड के कटरमाला पंचायत के बीच वाया नदी ने सदियों पहले विभाजन रेखा खींच दी थी। उसकी त्रासदी आज भी दोनों पंचायत ही नहीं बल्कि पूरे इलाके के करीब पचास हजार से अधिक की आबादी झेलने को मजबूर है।

हरवंशपुर बांबू पंचायत के वारिशपुर माल स्थित इस घाट से उस पार कटरमाला पंचायत के बेलवर को देख तो सकते हैं पर किसी वाहन से हों तो वहां पहुंचने के लिए गोढियां पुल होकर 09 किलोमीटर का फासला तय करना होगा। आजादी बाद भी यहां के लोगों का नदी पर पुल का सपना पूरा नहीं हो पाया है। संपर्क पथ होने पर ही नदी पर पुल बनाए जाने के अजीबोगरीब नियम के कारण नदी पर पुल नहीं बन पा रहा है। दोनों पंचायत के लोग नदी में पड़ी एक सेट पीपा को रस्सी के सहारे खींच कर इस पार-उस पार होकर जान जोखिम में डाल रहे हैं।

घर इधर तो जिंदगी उस पार
भगवानपुर प्रखंड के हरवंशपुर बांथू पंचायत के वारिशपुर माल, चकाकू गांव व गोरौल प्रखंड के कटरमाला पंचायत के वेलवर के बीच वाया नदी का पाट सदियों से बाधा बनी है। त्रासदी यह है कि वारिशपुर माल, चकाकू गांव के लोगों का घर इस पार है तो खेत व जिंदगी की अहम कड़ी उस पार ही है। वेलवर में ही हाईस्कूल भी है। वारिशपुर माल ही नहीं हरवंशपुर पंचायत के सैकड़ों स्कूली बच्चे बांया नदी पारकर बेलवर स्थित हाई स्कूल जाते हैं। बेलवर की ओर से हाजीपुर-मुजफ्फरपुर एनएच 22 पर बस पकड़ने के लिए नदी पारकर जाना पड़ता है।

पार उतरने के लिए जुगाड़ बन गया पीपा सेट
नदी का पानी सिंचाई के लिए उपयोग में लाए जाने के लिए 2000 में उद़्वह सिंचाई योजना के तहत पीपा सेट पर पंपिग सेट लगाया गया था। पंपिग सेट नदी से पानी खींच कर खेतों तक पानी पहुंचाता था। दो साल बाद ही पंपिंग सेट खराब हो जाने के बाद सिंचाई विभाग ने सुधि नहीं लिया।

आसपास के लोगों के लिए यही पीपा सेट वरदान बन गया। स्थानीय लोगों ने पीपा सेट पर सेट पंपिग सेट को उतार दिया। पीपा सेट के साथ पंपिग सेट नदी की धारा में बह न जाए इसके लिए रस्सी के सहारे नदी के दोनों छोर पर प्वांइट बना दिया गया था। इस पार व उस पार के लोग अपनी जरूरत के अनुसार सेट को खींच कर पटवन कर सकते थे। अब लोग इसका उपयोग पार उतरने के लिए कर रहे हैं।

नदी पार करो नहीं तो 09 किलोमीटर चक्कर काटकर आओ
बात दो पंचायतों के करीब 25 हजार जनता की नहीं नदी के इधर व उस पार के करीब पचास हजार से अधिक बड़ी आबादी की है। नदी में साल में छह माह तक पानी रहता है। पानी सूखने के बाद भी नदी का तल गहरा होने के कारण गाडियों के लिए इस पार-उस पार होना मुश्किल है।

पैदल हो तो ठीक हैं वर्ना गोढिया पुल होकर सामने दिख रहे गांव में आने के लिए नौ किलोमीटर का चक्कर लगाना पड़ता है। हालांकि खेती, रोजमर्रा के काम व स्कूल जाने वाले बच्चे उफनती नदी हो या बरसात पर बांद शांत हो गई नदी, वे संजीवनी बनी पीपा सेट के सहारे ही पार उतरते हैं।

बनते-बनते रह गया पुल
स्थानीय लोगों ने बताया कि 2008 में वाया नदी पर पुल निर्माण की स्वीकृति दी गई थी। पुल निर्माण के लिए मिट्टी जांच भी कराई गई थी। बताया गया कि 2010 के बाद सरकार ने कथित रूप से प्रावधान कर दिया गया संपर्क पथ से जुडे होने पर ही किसी नदी व लेक पर पुल बनेगा। नए नियम के कारण पुल निर्माण योजना अटक गया।

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