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छठे पातशाह श्री गुरु हरगोबिंद साहिब:वातावरण प्रेमी थे बाबा दया सिंह, काला संघिया ड्रेन को प्रदूषण मुक्त करने में संत सीचेवाल को दिया सहयोग

वडाला कलां12 दिन पहले
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  • संत बाबा दया सिंह जी के निधन से सिख पंथ को हुआ बड़ा नुकसान, गुरुद्वारा श्री टाहली साहिब में अंतिम संस्कार

छठे पातशाह श्री गुरु हरगोबिंद साहिब जी की चरण स्पर्श प्राप्त गुरुद्वारा श्री टाहली साहिब गांव बलेरखानपुर के मुख्य सेवादार संत बाबा दया सिंह जी का निधन हो से सिख पंथ को बड़ा घाटा हुआ है। उनकी मौत के बाद पूरे विश्व की सिख संगत में शोक की लहर है। संत बाबा दया सिंह का अंतिम संस्कार गुरुद्वारा टाहली साहिब में ही किया गया। वहीं, गुरुद्वारा साहिब के बाहर पुलिस टीमें भी तैनात कर दी गई है।

बाबा दया सिंह का जन्म 17 अक्टूबर 1954 को राजस्थान के जिला अनवर के गांव बीजवा में हुआ था। उनके पिता का नाम बंता सिंह और माता का नाम वीर कौर था। बाबा दया सिंह जी के संगे भाई सुलक्खन सिंह ने बताया कि वह 5 भाई और एक बहन है। बाबा दया सिंह का परिवार राजस्थान से जिला कपूरथला के गांव फजलाबाद में आकर रहने लग पड़ा था। बाबा दया सिंह फजलाबाद रहते हुए बाबा तेजा सिंह की संगत करने लग गए और गुरुद्वारा गुरसर साहिब गांव सैफलाबाद में रहने लगे जहां उन्होंने अमृतपान किया और गुरु वाले बने।

अमृत ग्रहण करने से पहले बाबा का नाम निर्मल सिंह था और अमृत ग्रहण के बाद बाबा तेजा सिंह जी ने उनको बाबा दया सिंह का नाम दे दिया। बाबा दया सिंह ने प्राथमिक विद्या सैफलाबाद के ही स्कूल से प्राप्त की। फिर बाबा तेजा सिंह जी ने उनको मेहता चौक दमदमी टकसाल में धार्मिक शिक्षा के लिए भेज दिया। जहां बाबा दया सिंह काफी समय रहे। उन्होंने साथ-साथ वैद्य का ज्ञान भी प्राप्त किया। देसी दवाओं में काफी निपुणता हासिल कर ली। इसके बाद बाबा जी सैफलाबाद वापस आ गए और बाबा तेजा सिंह की ओर से उन्हें छठे पातशाह की चरण स्पर्श गुरुद्वारा टाहली साहिब गांव बलेरखानपुर का मुख्य सेवादार बना दिया।

बाबा दया सिंह देसी दवाओं की करते थे सेवा

गुरुद्वारा टाहली साहिब की मौजूदा पुरानी इमारत का नींव पत्थर संत जरनैल सिंह खालसा भिंडरावालों ने 1978 में रखा था। बाबा दया सिंह पिछले लम्बे समय से गुरुद्वारा टाहली साहिब में मुख्य सेवादार के तौर पर सेवा निभा रहे थे। जहां बाबा जी गांव बलेरखानपुर के सरपंच थे। वहीं, वह एक शिरोमणि वैद्य के रुप में अलग-अलग बीमारियों की देसी दवाओं की भी सेवा करते थे।

बाबा दया सिंह वातावरण प्रेमी भी थे। उन्होेंने गुरुद्वारा के आसपास के गांवों में भारी संख्या में पौधे लगाए। गुरुद्वारा श्री टाहली साहिब के नजदीक से बहती काला संघिया ड्रेन को प्रदूषण मुक्त करने के लिए वातावरण प्रेमी संत बाबा बलबीर सिंह सीचेवाल की ओर से शुरू किए गए संघर्ष में बाबा दया सिंह साथ देते थे। छठे पातशह के प्रकाशोत्सव मौके हर साल 5 जुलाई को जोड़ मेला गुरुद्वारा टाहली साहिब में श्रद्धापूर्वक करवाया जाता था।

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