नई पहल के सकारात्मक नतीजे:एसएनसीयू वार्ड में 3 माह में 1000 नवजात गंभीर हालत में दाखिल हुए, इनमें 99% स्वस्थ

जालंधर10 दिन पहलेलेखक: प्रभमीत सिंह
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सिविल अस्पताल में बच्चों को फीडिंग और उनकी संभाल के लिए जानकारी देते हुए डॉक्टर व अन्य। - Dainik Bhaskar
सिविल अस्पताल में बच्चों को फीडिंग और उनकी संभाल के लिए जानकारी देते हुए डॉक्टर व अन्य।
  • प्राइवेट अस्पताल में जिस इलाज के प्रतिदिन के 5 हजार से 10 हजार रुपए देने पड़ रहे थे, वह सिविल अस्पताल में मुफ्त में मिलना शुरू
  • आईसीयू वार्ड में मां को बच्चे को दूध पिलाना, उठाना और नहलाना तक टीवी पर समझाया जा रहा ताकि नवजात की सही संभाल हो सके

अक्सर सरकारी अस्पताल को लेकर धारणा रहती है कि वहां सही इलाज नहीं होगा और सुविधा नहीं मिलेगी, लेकिन सिविल अस्पताल जालंधर की तस्वीर बदल रही है। अस्पताल के जिस विभाग में सबसे ज्यादा प्रगति हुई है और मरीज तंदुरुस्त हुए, वह जच्चा-बच्चा विभाग है।

डाॅक्टर्स की नई टीम ने अस्पताल में गंभीर हालत में आने वाले बच्चों का इलाज किया तो नतीजे बदलने लगे। हालात यह हैं कि जच्चा-बच्चा वार्ड के एसएनसीयू विभाग में 3 माह में एक हजार बच्चे दाखिल हुए, जिनमें से महज 10 की मृत्यु हुई जबकि 99 फीसदी ठीक होकर घरों को चले गए। डाॅक्टर बताते हैं ऐसा सिर्फ बच्चे के इलाज के बदले नियमों और बच्चे के परिजनों को उनके बच्चे के साथ साये की तरह रखने से हुआ है।

निजी अस्पतालों में रेफर नहीं किए गए गंभीर बच्चे

जच्चा-बच्चा विभाग में बने एसएनसीयू वार्ड में निमोनिया, सांस लेने में तकलीफ, कम एक्टिव होने के अलावा कम वजन या समय से पहले डिलीवरी वाले नवजन्मे बच्चे रखे जाते हैं। तीन माह में वार्ड में 300 से अधिक बच्चे दाखिल किए गए, जिनका वजन 600 ग्राम से 1 किलो 300 ग्राम था।

खास बात है कि किसी भी बच्चे को प्राइवेट अस्पताल रेफर नहीं किया गया। प्राइवेट अस्पताल में इस इलाज के प्रतिदिन 5 हजार से 10 हजार रुपए खर्च आता है। सिविल में किसी बच्चे की हालत क्रिटिकल हुई है तो उसे पीजीआई या अमृतसर ही रेफर किया गया।

मां की गोद हर मर्ज का इलाज, ऐसा कंगारू मदर केयर से मुमकिन हुआ

‘नवजन्मे बच्चे का जन्म के दौरान वजन कम है या वह बीमार है तो उसका इलाज मां की गोद में ही छिपा है। कंगारू मदर केयर (केएमसी) से ऐसा मुमकिन हुआ है।’ यह बात सिविल अस्पताल के चाइल्ड स्पेशलिस्ट डाॅ. साहिल विकास ने कही। उन्होंने कहा कि केएमसी का मुख्य उद्देश्य बच्चे के शरीर का तापमान स्थिर रखना है। केएमसी में बच्चे और उसके परिजन को दिन में 7 से 8 घंटे तक छाती के साथ लगाकर रखने के लिए कहा जाता है।

नई पहल : बच्चे के बेड पर ही ईको टेस्टिंग और अन्य सुविधाएं उपलब्ध

सिविल अस्पताल जालंधर का पहला ऐसा सरकारी अस्पताल है, जहां नवजन्मे बच्चे के बेड पर ही ईको टेस्टिंग मशीन लगाई गई है। यह मशीन बच्चे के दिल और दिमाग की भी जांच करती है। दूसरी तरफ अस्पताल में ऑटोमेटिड ऑडिटर ब्रेनिंग स्ट्रीम रिस्पाॅन्स मशीन भी लगाई गई है, जो बच्चे कि यह जांच करती है कि बच्चा सुनने में सक्षम है या नहीं।

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