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पर्यावरण संरक्षण:जालंधर में हरियाली बढ़ाने के लिए 13000 सीड बॉल तैयार, लोगों को मुफ्त मिलेंगे आम, अमरूद, जामुन, लसूड़ी, फालसा के बीज

जालंधर4 दिन पहले
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  • जापान से मियावाकी विधि के बाद पंजाबियों ने सीखा हरियाली बढ़ाने का नया पाठ
  • कोरिया में आज भी सीड बॉल के जरिये की जा रही है चावल की खेती

शहरवासी आने वाले दिनों में बागबानी अधिकारियों के मुंह से बार-बार नया शब्द ‘सीड बाॅल’ सुनेंगे। इसका मतलब बीजों की गेंद है। ऐसी 13000 गेंद जालंधर में हरियाली बढ़ाने के लिए तैयार की गई है। इनमें ज्यादातर फलदार पौधे शामिल हैं। पंजाबियों ने हरियाली में इजाफे के लिए जापान से दूसरा पाठ सीखा है, जिसे अब बागबानी विभाग के जरिये लागू किया गया है। जालंधर के डिप्टी कमिश्नर घनश्याम थोरी के ऑफिस में इस प्लानिंग की लाॅन्चिंग मंगलवार को की गई। फिलहाल आम, अमरूद, जामुन, लसूड़ी, फालसा के बीज बॉल तैयार किए जा रहे हैं।

जमीन पर फेंकें या बोएं, सीजन आने पर पौधा पनपेगा
वर्ष 1930 में विश्वयुद्ध में जापान अपने सारे संसाधन खर्च कर रहा था तो इसी दौरान हरियाली की बर्बादी भी अलग-अलग देशों की सेनाओं ने की थी। तब एक हरियाली प्रेमी जापानी मोसांबी फुकुअकी ने हरियाली बढ़ाने की गोरिल्ला तकनीक इजाद की थी। इसमें विभिन्न पौधों के बीजों को मिट्टी में लपेटकर गेंद के तौर पर तैयार कर लिया जाता है।

आप चाहे तो अलग-अलग मौसम में बारी-बारी से विशेष प्रकार के पौधे सीजनल तौर पर उगाने के लिए इस गेंद में डाल सकते हैं। जब इसे जमीन में फेंक देंगे या फिर बो दीया जाएगा तो सीजन का पौधा बाहर आएगा और फिर अगले महीनों में अगली किस्म का पौधा फल-फूल दे सकता है।​​​​​​​

सार्वजनिक स्थलों पर पौधे लगाने के लिए लोगों को मिलेंगे मुफ्त में बाॅल
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सीड बॉल को जमीन में डालने से चंद घंटे पहले थोड़ा सूखा लिया जाता है। इसे आम लोगों को दिया जाएगा ताकि वे सार्वजनिक स्थानों पर लगा सकें। इस तकनीक से सेहतमंद बीज जमीन में डाले जाते हैं, जोकि अगले कुछ दिनों में अंकुरित हो जाएंगे और सितंबर तक चलने वाली बरसातों का लाभ उन्हें होगा। बागबानी विभाग की डायरेक्टर शैलेंद्र कौर के अनुसार यह तरीका पंजाब के विभिन्न जिलों में अपनाया जा रहा है।

550वें प्रकाशोत्सव पर जालंधर में अपनाई गई थी तकनीक
जंगलात विभाग के जानकार बताते हैं कि इससे पहले श्री गुरु नानक देव जी के 550वें प्रकाशोत्सव समारोह के दौरान छोटे-छोटे जंगल बनाने के लिए मियावाकी तकनीक पंजाब में लागू की गई थी, वह भी जापानी विधि से ही लिया गया आइडिया है।

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