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भविष्य पर रखे विचार:सभी धर्म पर्यावरण संरक्षण के पक्षधर अगली क्रांति अब भूमि केंद्रित होगी

जालंधर10 दिन पहले
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धान की कटाई के बाद पराली का निस्तारण करती मशीन।
  • विश्व खाद्य पुरस्कार विजेता डॉ. मणि ने खेती के भविष्य पर रखे विचार

एग्रो भास्कर | जालंधर विश्व खाद्य पुरस्कार विजेता और ओहियो स्टेट यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक डॉ. रतन लाल ने पीएयू में पहुंचकर अगली हरित क्रांति पर बात की। डॉ. रतन लाल पीएयू के पूर्व छात्र रहे हैं। पूरे देश से लगभग 6 प्रगतिशील वैज्ञानिकों ने उनके भाषण का लाभ उठाया। पीएयू में हुए वेबिनार का शीर्षक था ‘भूमि केंद्रित हरित क्रांति : अनुकरणीय परिवर्तन। अपने भाषण में डॉ. रतन लाल ने विशेषज्ञों को एक नई भूमि-केंद्रित हरित क्रांति के लिए बुलावा दिया और गुरबाणी की “पवन गुरु, पानी पिता, माता धरत महत” की पंक्ति को दोहराया। उन्होंने कहा कि गुरु नानक देव जी ने बहुत आसानी से पर्यावरण के तीन स्तंभों - वायु, जल और पृथ्वी का उल्लेख किया है। डॉ. लाल ने कहा कि सभी धर्मों ने प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण की बात की है और अगली हरित क्रांति को इन्हीं नियमों के केंद्र में रखा जाना चाहिए। पीएयू के दिए गए योगदान की सराहना करते हुए उन्होंने कहा कि जब देश खाद्य संकट से जूझ रहा था तो पीएयू ने किसानों का मार्गदर्शन करके देश को खाद्यान्न में आत्मनिर्भर बनाया। अब यह गर्व से कहा जाता है कि भारत दुनिया में गेहूं और धान का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है जबकि यह धान का शीर्ष निर्यातक है।

मिट्‌टी में कार्बन बढ़ाने पर की चर्चा

मिट्टी की गुणवत्ता में गिरावट, प्रदूषित पानी और प्रदूषित हवा के साथ-साथ जैव विविधता के नुकसान के कारण हमारी धरती दुविधा में है। डॉ. रतन लाल ने पृथ्वी से सब कुछ हासिल करने की प्रवृत्ति की निंदा की। उन्होंने अफ्रीका का उदाहरण दिया, जहां पृथ्वी में अधिक पोषक तत्व नहीं बचे हैं और उस मृत पृथ्वी में भी अच्छी किस्मों, उर्वरकों और कीटनाशकों का कोई प्रभाव नहीं है। भारत में अनियमित शहरीकरण के बारे में बात करते हुए डॉ. रतन लाल ने कहा कि आने वाले वर्षों में आवास के लिए 2.5 हेक्टेयर भूमि की आवश्यकता होगी। उन्होंने बड़े शहरों में मानव और पशु कचरे का उपयोग करके शहरी कृषि और खाद्य उत्पादन पर जोर दिया। वहीं डॉ. रतन लाल ने ईंट बनाने के लिए धान के पुआल के इस्तेमाल की वकालत की। उन्होंने कहा कि बायोचार, खाद, जड़ों के जैविक पदार्थ, फसल के अवशेष मिट्टी में कार्बनिक पदार्थों को बढ़ाते हैं। वैज्ञानिकों से कम पानी, कम उर्वरकों और रसायनों का उपयोग करने के लिए कम कार्बन का उपयोग करने के तरीकों के साथ आगे आने का भी आह्वान किया।

‘शहरी कृषि के मॉडल पर भी काम की जरूरत’
पीएयू के वाइस चांसलर डॉ. बलदेव सिंह ढिल्लों ने कहा कि पंजाब में उत्पादित गेहूं और धान का 90% राज्य से बाहर जाता है जो प्राकृतिक पोषण के दायरे को बाधित करता है। डॉ. रतन लाल दूसरों के विचार अनिवार्य रूप से इस संबंध में दिशा-निर्देशों के रूप में काम करेंगे। पीएयू जल संरक्षण, खेत में पुआल प्रबंधन और धान की सीधी बुवाई के लिए प्रतिबद्ध है। डॉ. ढिल्लों ने शहरी कृषि के मॉडल पर काम करने की आवश्यकता पर जोर दिया।

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