वित्त विभाग ने फिलहाल जारी किया वेतन:सिविल सर्जन कार्यालय के अधिकारियों-कर्मचारियों को 9वें महीने तक सैलरी देने के आदेश

जालंधर3 महीने पहले
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सिविल सर्जन ऑफिस का गेट बंद कर विरोध करते कर्मचारियों की फाइल फोटो - Dainik Bhaskar
सिविल सर्जन ऑफिस का गेट बंद कर विरोध करते कर्मचारियों की फाइल फोटो

वित्त विभाग ने सिविल सर्जन कार्यालय के तहत काम करने वाले अधिकारियों-कर्मचारियों की मांग को फिलहाल मान लिया है। वित्त विभाग ने सभी की रुकी हुई सैलरी जारी करने के आदेश दे दिए हैं। राज्य वित्त विभाग ने पत्र जारी कर वेतन के पैसे जारी करने की मंजूरी दे दी है। वेतन रुकने का खतरा अभी टला नहीं है। पत्र में स्पष्ट लिखा है कि वित्त विभाग ने यह मंजूरी सिर्फ 9वें महीने तक ही दी है। यदि 9वें महीने में वित्त विभाग ने मंजूरी को आगे नहीं बढ़ाया तो फिर से अधिकारियों-कर्मचारियों की सैलरी रुक जाएगी।

अभी तक सिविल सर्जन ऑफिस में सैलरी का कोई स्थायी हल निकल कर सामने नहीं आया है। वित्त विभाग ने पत्र में लिखा है कि अभी तक सिविल सर्जन ऑफिस में जांच चल रही है और उसकी कोई रिपोर्ट उन तक नहीं पहुंची है। इसलिए फिलहाल 9वें महीने तक की सैलरी दिए जाने के आदेश दिए गए हैं। रिपोर्ट आने के बाद जिनकी भी चिकित्सक को नौकरी से हटाए जाने में शामूलियत या जॉइनिंग न करवाने में गलती पाई जाएगी फिर 86 लाख की रिकवरी उनके खातों से होगी।

वित्त विभाग से जारी पत्र
वित्त विभाग से जारी पत्र

बता दें कि मंगलवार को सिविल सर्जन ऑफिस के मुख्य गेट पर स्टाफ ने ताला लगा दिया और सभी जब सड़क पर बैठ गए थे तो जिला प्रशासन ने एडीसी को मौके पर भेजा। एडीसी ने धरना प्रदर्शन यह आश्वासन देकर बंद करवाया था कि उनके वेतन को लेकर विचार मंथन चल रहा है। पत्र विभाग को लिखा गया है। कर्मचारियों, जिनमें सिविल सर्जन और चिकित्सक भी शामिल थे, ने अल्टीमेटम दिया कि वह सिर्फ एक दिन का समय देंगे। बुधवार को सैलरी पर फैसला हो गया तो ठीक नहीं तो सामूहिक अवकाश ले लेंगे और सारा कामकाज ठप कर देंगे। इसके अलावा वह सिविल सर्जन ऑफिस पर ताला जड़ देंगे और विरोध करेंगे।

उल्लेखनीय है कि अप्रैल महीने की सैलरी कर्मचारियों को अधिकारियों को अभी तक नहीं मिली है। कोर्ट के आदेश पर एक चिकित्सक को दिए 86 लाख का खामियाजा अब नीचे से लेकर ऊपर तक सभी भुगतना पड़ रहा है। अधिकारियों-कर्मचारियों का कहना है कि 1984-85 का मामला है। उस समय के अधिकारी-कर्मचारी रिटायर भी हो चुके हैं, लेकिन उनके किए धरे की सजा मौजूदा स्टाफ को दी जा रही है। अफसरों का कहना है कि उनका कसूर सिर्फ इतना है कि निष्पक्ष जांच में उन्होंने पूरी ईमानदारी के साथ जांच एजेंसी का साथ दिया। उन्हें जो रिकार्ड चाहिए था वह उपलब्ध करवाया।

दर्जा दो से लेकर चार के कर्मचारियों का कहना है कि किसी चिकित्सक की नियुक्ति या फिर उसे नौकरी से हटाने में बड़े अधिकारियों का काम है। चिकित्साधिकारियों का कोई भी मामला उनके सिर से ऊपर का है। वह तो खुद उनके अधीन काम करते हैं। फिर उन्हें क्यों परेशान किया जा रहा है। वेतन न मिलने से घरों के बजट बिगड़ गए हैं। महंगाई के इस युग में वह बच्चों की फीस तक नहीं भर पा रहे हैं।