जेब को राहत:आलू के टिश्यू कल्चर तरीके का विकास, 4-5 साल की बजाय 2 साल में ही मिलेगा उम्दा बीज

जालंधर3 महीने पहले
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नई टेक्नोलॉजी का ट्रांसफर शुरू हुआ, आलू बीज उत्पादन के खर्च में बढ़ोतरी नहीं होगी और किसानों के समय व पैसे की बचत होगी - Dainik Bhaskar
नई टेक्नोलॉजी का ट्रांसफर शुरू हुआ, आलू बीज उत्पादन के खर्च में बढ़ोतरी नहीं होगी और किसानों के समय व पैसे की बचत होगी

आलू ऐसी सब्जी है, जिसे पर किसी खास दिन पर न खाने की बंदिश नहीं। किसी धर्म या जाति में इसे खाने की मनाही नहीं। एेसे में छोटे होते खेतों में आलू ऐसी इकलौती फसल है, जिसे एरोपोनिक्स तरीके से पैदा किया जा रहा है। इसमें पॉली हाउस में टिश्यू कल्चर में छिड़काव करके खुराक दी जाती है व नीचे ड्रायर की तरह टेबल टॉप के नीचे लगे बॉक्स में जड़ों को आलू आ रहे होते हैं यानी हवा में आलू का उत्पादन किया जाता है। अब वैज्ञानिकों ने आलू की खेती की नई विधि विकसित कर ली है, जिसका नाम एपीकल रूटेड कटिंग है।

अभी तक आलू बीज तैयार करने के पारंपरिक तरीके में सबसे उम्दा बीज तैयार करने में 4-5 साल लग जाते थे। अब नई टेक्नीक में 2 साल में ही उम्दा आलू बीज मिल जाएगा। ऐसा टिश्यू कल्चर के नए तरीके का विकास करने से हुआ है। इस तकनीक को सरल व गैर सरकारी तौर पर विकसित करने में 3 साल लग गए हैं। जालंधर के बादशाहपुर स्थित केंद्रीय आलू खोज केंद्र ने शिमला, शिलौंग व पंजाब में जगह जगह नई टेक्नीक वाले पौधे बांटे व अच्छे नतीजे मिलने के बाद अब कई आलू उत्पादकों के साथ इस्तेमाल करने वाले अधिकार देने वाला समझौता किया है।

एपीकल रूटेड कटिंग टेक्नोलॉजी से सीधे खेत में लगेगा आलूॉ

आम लोग यही जानते हैं कि खेत में आलू बोने के बाद इसकी जड़ों में नए आलू मिल जाते हैं, लेकिन हकीकत में आलू सबसे पहले एक पौधे में ही लगता है। यही टिश्यू कल्चरिंग हैं। टिश्यू कल्चर से बने पौधों में पहला बीज लगता है, फिर उसे बार-बार हर सीजन में लगाया जाता है। जैसे इंसान की पीढ़ी बढ़ती है, वैसे ही आलू का कुनबा बढ़ रहा होता है। पीढ़ी दर पीढ़ी आलू के बीज लेते हुए 4-5 साल लग जाते हैं। सबसे उम्दा बीज लेने में जिसका उत्पादन भी शीर्ष पर होता है व बीमार से लड़ने की ताकत भी ज्यादा होती है। जब ये पीढ़ी कमजोर पड़ जाती है तो टिश्यू कल्चर से पैदा हुआ नया बीज खेतों में लगाना शुरू करते हैं।

नई एपीकल रूटेड कटिंग टेक्नोलॉजी से जैसे टिश्यू कल्चर से पैदा आलू सीधे खेत में लगा दिया जाएगा। इसके उतनी देर मल्टीपल करने की जरूरत नहीं, जब तक अच्छे नतीजे चाहिएं। नई टेक्नोलॉजी को आलू उत्पादकों को ट्रांसफर करने के बाद सीपीआरसी के जालंधर केंद्र के हेड डॉ. राम कुमार ने कहा कि नई विधि के इस्तेमाल से आलू बीज में तेजी आएगी। टेक्नोलॉजी का ट्रांसफर 3 लोगों को दिया गया है।

इस दौरान आलू खोज केंद्र शिमला के डायरेक्टर डॉ. एनके पांडे चीफ गेस्ट थे। जिक्रयोग है कि सिटी के कुछ घरों में भी अब लोगों ने घर में फसल की बुआई शुरू कर दी है। न्यू हरदयाल नगर के रहने वाले अरविंदर सिंह ने बताया कि उन्होंने जो आलू घर में उगाया है, उसमें किसी तरह का कीटनाशक इस्तेमाल नहीं किया है। हालांकि यह देसी किस्म का आलू है, लेकिन स्वाद में काफी बेहतर है। इसी तरह प्रतापपुरा के रहने वाले किसान हरबंस सिंह ने बताया कि आजकल आलू की फसल घर में उगाने का चलन शुरू हुआ है। इससे लोगों का खेती और पर्यावरण सुरक्षा की तरफ ध्यान बढ़ा है।

जालंधर की इकॉनामी को मिलेगा भरपूर फायदा
आलू बीज पैदा करके जालंधर के किसान-ट्रेडर्स पूरे देश को सप्लाई करते हैं। बीज उत्पादन में इजाफा होने से जालंधर को आर्थिक लाभ होगा। रोजगार बढ़ेगा।

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