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हिम्मत बनाए रखें:हर कोरोना मरीज को अस्पताल में दाखिल होने की जरूरत नहीं, संक्रमित हुए 32000 मरीजों ने होम आइसोलेट होकर कोरोना से जंग जीती

जालंधर6 महीने पहले
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फाइल फोटो - Dainik Bhaskar
फाइल फोटो

हर कोरोना संक्रमित मरीज को अस्पताल में भर्ती होने की जरूरत नहीं है। वर्तमान में अधिकतर लोग संक्रमण से घबराकर खुद अस्पताल पहुंच रहे हैं और खुद ही सीटी स्कैन और अन्य टेस्ट करवा रहे हैं। ये एेसे मरीज हैं, जिनकी न तो ऑक्सीजन सेचुरेशन कम हो रही है और न ही इन्हें सांस लेने में कोई दिक्कत हो रही है।’ ऐसा कहना है सेहत विभाग के डॉक्टर्स का। उनका कहना है कि लोग तब तक अस्पताल में न जाएं, जब तक उन्हें कोरोना के गंभीर लक्षण नहीं दिखते। सिविल अस्पताल के मेडिसन स्पेशलिस्ट डॉ. सुरजीत सिंह का कहना है कि अस्पताल में बिना वजह दाखिल होने के बाद या खुद की तरफ से सीटी स्कैन और चेस्ट का एक्सरे करवाना ठीक नहीं है। बीते 13 महीने में जिले के 32 हजार से अधिक मरीज कोरोनावायरस की पुष्टि होने के बाद होम आईसोलेट हुए हैं। इनमें से 138 को अस्पताल में रेफर किया गया है। इसके अलावा 14 लोगों की मौत भी हुई है। होम आइसोलेशन की इंचार्ज पीसीएस नवनीत बल का कहना है कि सभी होम आइसोलेट मरीजों को टीमें फोन करती हैं जबकि 60 साल से अधिक उम्र के लोगों से तीन डॉक्टरों का पैनल बात करता है और उनकी काउंसलिंग करता है।

संक्रमितों की कुल गिनती 42917 तक पहुंची जिले में शुक्रवार तक कुल संक्रमितों की संख्या 42917 तक पहुंच गई है। जबकि शुक्रवार की रिपोर्ट के अनुसार 13 महीनों में 32 हजार लोग होम आइसोलेट हुए हैं। ये ऐसे लोग हैं, जिन्होंने कोरोना पर फतेह हासिल की है। इनमें 62 फीसदी पुरुष और 38 फीसदी महिलाएं होम आइसोलेट थीं।

होम आइसोलेट हैं तो अपनी दिनचर्या में सुधार करना बेहद जरूरी

संक्रमित व्यक्ति के लिए सबसे जरूरी है कि उसका व्यवहार न बदले। जैसी दिनचर्या पहले थी, वैसी ही रखे। लेकिन खुद को आइसोलेट कर खुद को घर के बाकी सदस्यों से दूर रखना बेहद जरूरी है ताकि संक्रमण किसी और को न हो। मार्च में संक्रमित हुए संजय गुप्ता बताते हैं कि उन्हें जब संक्रमण हुआ, तब पहले अस्पताल में अपना चेकअप करवाया। दो दिन अस्पताल में रहने के बाद घर में आकर खुद को 17 दिन तक होम आइसोलेट किया और कमरे से बाहर नहीं निकला। फायदा यह हुआ कि घर का कोई और सदस्य उनसे संक्रमित नहीं हुआ। कोरोना के कारण दिनचर्या काफी खराब हो चुकी थी।

पहले रोज सुबह 5 बजे उठता था, संक्रमण के कारण 7 से 8 बजने लगे। इतना पता था कि फिट रखूंगा तो जल्दी रिकवर कर लूंगा। कमरे में 40 कदम गिने और आधा घंटा सैर करने लगा। होम आइसोलेशन के दौरान खाना डिस्पोजेबल बर्तनों में ही खाया और कूड़ा गार्बेज बैग में डाला, जिसे 17 दिन बाद ही फेंका। इसी दौरान उनकी पत्नी रीटा गुप्ता को भी संक्रमण ने चपेट में ले लिया था। अब दोनों बिलकुल ठीक हैं। वहीं, जीटीबी नगर के सुधीर वालिया का कहना है कि घर में अकेले रहकर सुबह-शाम सैर की और दो से तीन बार अपनी ऑक्सीजन भी चेक करते रहे।

परिवार का सहयोग : बेटी को पता चला तो बेंगलुरू से फ्लाइट लेकर घर आ गई, 17 दिन देखभाल की

संक्रमित को चाहिए कि खुद को मानसिक तौर पर तंग न होने दे। यह तभी संभव है, जब परिवार आपके साथ होता है। संजय और उनकी पत्नी रीटा गुप्ता कहते हैं कि वे आइसोलेट थे तो कमरे का दरवाजा खोल 10 फीट दूर बैठे बच्चों से बात करते थे। बेटी बेंगलुरू में थी, जो फ्लाइट लेकर घर आ गई। उसने 17 दिन देखभाल की। दूर बैठकर बेटे से बिजनेस की चर्चा भी करते रहे।

सांस लेने में परेशानी हो तो तुरंत अस्पताल पहुंचें

सिविल अस्पताल के मेडिसन स्पेशलिस्ट डॉ. सुरजीत सिंह का कहना है िक संक्रमण के बाद ऑक्सीजन लेवल 94 से नीचे हो या सांस लेने में परेशानी आए तो तुरंत अस्पताल जाना चाहिए। होम आइसोलेशन के दौरान ऑक्सीजन सेचुरेशन चेक करते रहें।

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