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  • If Captain Amarinder Joins BJP, It Will Be A Big Challenge For The Congress Party, Which Has Already Damaged The Image Of The Party.

पंजाब कांग्रेस की राह में बिछेंगे सियासी कांटे:कैप्टन BJP में गए तो कांग्रेस के लिए भी बड़ी चुनौती, चुनाव से पहले आपसी झगड़े में पार्टी की छवि को पहले ही नुकसान हो चुका

जालंधर20 दिन पहले
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कैप्टन अमरिंदर सिंह मंगलवार को दिल्ली में भाजपा के शीर्ष नेतृत्व से मिल रहे हैं। उनकी अलग राह पंजाब में कांग्रेस के सियासी भविष्य के लिए बड़ा खतरा बन सकती है। करीब 4 दशक बाद कैप्टन पार्टी छोड़ देते हैं, तो यह सिर्फ कैप्टन नहीं, बल्कि कांग्रेस के लिए भी चुनौती भरा होगा।

दरअसल, पंजाब कांग्रेस में कैप्टन और सिद्धू के झगड़े में न सिर्फ चुनाव से पहले का महत्वपूर्ण समय बर्बाद हुआ, बल्कि पार्टी की छवि को भी नुकसान पहुंचा। इससे 2022 में कांग्रेस की जीत भी खतरे में पड़ गई है। कैप्टन रास्ता बदलते हैं, तो 5 महीने बाद होने वाले चुनाव तक का समय पार्टी की बगावत संभालते ही कट जाएगा।

कैप्टन गांवों में अपने आक्रामक रुख तो शहरों में सौहार्द के लिए लोकप्रिय
कैप्टन अमरिंदर सिंह पंजाब की राजनीति का दिग्गज चेहरा हैं। 2002 हो या फिर 2017, वे अपने चेहरे के बूते ही कांग्रेस को सत्ता में लाए। यह बात कांग्रेस के भीतर उनके विरोधी भी मानते हैं। पंजाब के गांवों में कैप्टन के आक्रामक रुख को पसंद किया जाता है। वहीं, सामुदायिक सौहार्द के लिए वे शहरी तबके की पहली पसंद हैं। इसका असर पिछले चुनाव में दिखा, जहां कांग्रेस को गांवों से ज्यादा सीटें शहरों में मिलीं।

राजनीति पर पकड़ ऐसी कि मोदी लहर में भी अरुण जेटली को पटखनी दी
कैप्टन अमरिंदर सिंह का सियासी अनुभव बेजोड़ है। 2014 में जब पूरे देश में मोदी लहर चल रही थी, तब भाजपा ने अमृतसर से अपने बड़े नेता अरुण जेटली को लोकसभा चुनाव लड़ने भेजा। कैप्टन वहां उनसे भिड़ने चले गए। कैप्टन को प्रचार के लिए एक महीने का ही वक्त मिला था, लेकिन जेटली हारकर दिल्ली लौटे। ऐसे वक्त में जब भाजपा के कई नेता मोदी के नाम पर जीत गए, कैप्टन ने दिखाया कि पंजाब की राजनीति में उनसे बड़ा सूरमा कोई नहीं है।

पहली बार जनता से जुड़े रहे, लेकिन बाद में लोगों से कटते चले गए कैप्टन
2002 में पहली बार कैप्टन की अगुआई में कांग्रेस की सरकार बनी। इस सरकार में उनका दबदबा रहा, लेकिन जब 2017 में कांग्रेस दोबारा सत्ता में आई तो वे धीरे-धीरे वो जनता से दूर होते चले गए। उनके सलाहकारों और अफसरों पर ही लोगों से संपर्क का जिम्मा आ गया। उनमें से अधिकतर ने जिम्मेदारी निभाने के बजाय मनमानी शुरू कर दी, जिसका खामियाजा कैप्टन को CM की कुर्सी छोड़कर भुगतना पड़ा। कैप्टन क्या वाकई फिर से पंजाब में लोगों को नई पार्टी से प्रभावित कर सकते हैं, इसको लेकर सियासी चर्चाएं गर्म हैं।

जो काम सुखबीर सिंह और भगवंत मान न कर सके, उसे सिद्धू कर गए
पंजाब में कैप्टन सरकार गिराने में अकाली दल के प्रधान सुखबीर बादल और आम आदमी पार्टी के पंजाब अध्यक्ष भगवंत मान भी लगे रहे। उन्हें तो कामयाबी नहीं मिली, लेकिन नवजोत सिंह सिद्धू ने यह कर दिखाया। उन्होंने कांग्रेस को ही हथियार बनाया। हाईकमान का साथ लिया और कैप्टन को अपमानित होकर कुर्सी छोड़नी पड़ी। सिद्धू भले ही कामयाब हो गए, लेकिन पंजाब कांग्रेस के भीतर अब एक बगावत की परंपरा शुरू हो चुकी है। जो पहले कैप्टन के खिलाफ रही, तो अब भी मौजूदा सरकार और संगठन में एक-दूसरे के बीच सुलगती रहती है।

सरकार की नाकामी के लिए कैप्टन को जिम्मेदार ठहराने से नहीं बनेगी बात
पंजाब कांग्रेस पिछले साढ़े 4 साल की नाकामी का ठीकरा कैप्टन अमरिंदर सिंह पर फोड़ रही है, लेकिन यह इतना आसान नहीं है। कांग्रेस के जो विधायक साढ़े 4 साल से सत्ता सुख ले रहे हैं और मंत्री बने हुए हैं, उन्हें जनता को जवाब देना होगा। कांग्रेस के लिए सिर्फ कैप्टन को ही खलनायक बनाना इतना आसान नहीं रहेगा। उन्हें बताना होगा कि कैप्टन काम नहीं कर रहे थे, तो उन्हें बदलने या बगावत के लिए साढ़े 4 साल तक इंतजार क्यों किया गया?

क्या पंजाब में कांग्रेस बड़ा सियासी मौका चूक गई?
कांग्रेस के भीतर कैप्टन के रुख को लेकर बड़ा सवाल यह भी है कि क्या कांग्रेस पंजाब से लेकर राष्ट्रीय राजनीति में आने का बड़ा सियासी मौका चूक गई? ऐसा इसलिए क्योंकि पंजाब ही ऐसा राज्य था, जहां कांग्रेस दोबारा सत्ता में आती दिख रही थी। कैप्टन ने किसान आंदोलन का समर्थन कर किसानों को खुश कर रखा था। किसान पंजाब में सबसे बड़ा वोट बैंक हैं।

नवजोत सिद्धू के पंजाब प्रधान बनने की चर्चाओं से पहले पंजाब कांग्रेस में कोई बड़ी गुटबाजी नहीं थी। हालांकि अब सिद्धू व उनके करीबियों ने कैप्टन को निशाने के बहाने अपनी ही सरकार की नाकामियों की फेहरिस्त गिना रखी है। राजस्थान व दूसरे राज्यों में कांग्रेस बड़ी गुटबाजी का शिकार है। पंजाब में जीत मिलती तो 2024 लोकसभा चुनावों में कांग्रेस के पास राष्ट्रीय स्तर पर बड़ा हथियार था, जो अब मुश्किल लग रहा है।

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