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जालंधर में 18 से 20 सितंबर तक सोढल मेला:पिछले साल कोरोना की वजह से श्रद्धालुओं के आने पर थी रोक, इस बार कोविड प्रोटोकॉल के साथ कर सकेंगे बाबा के दर्शन

जालंधर9 महीने पहले
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जालंधर स्थित श्री सिद्ध बाबा सोढल मंदिर। - Dainik Bhaskar
जालंधर स्थित श्री सिद्ध बाबा सोढल मंदिर।

जालंधर का मशहूर सोढल मेला इस बार 18 से 20 सितंबर को होगा। मंगलवार को श्री सिद्ध बाबा सोढल मंदिर प्रबंधक कमेटी के साथ बैठक के बाद प्रशासन ने इसकी मंजूरी दे दी है। पिछली बार कोरोना महामारी के चलते मेले मे श्रद्धालुओं के आने पर रोक लगा दी गई थी। हालांकि इस बार भी मेले में आने वाले श्रद्धालुओं को कोविड से जुड़ी मास्क पहनने, सोशल डिस्टेंस जैसी सावधानियों का पालन करना होगा। डिप्टी कमिश्नर घनश्याम थोरी, पुलिस कमिश्नर डॉ. सुखचैन सिंह गिल व एसएसपी नवीन सिंगला ने कहा कि प्रशासन की तरफ से मेले के लिए पुख्ता इंतजाम किए जाएंगे।

मेला प्रबंधकों के साथ बैठक करते एडीसी अमरजीत बैंस, डीसीपी नरेश डोगरा।
मेला प्रबंधकों के साथ बैठक करते एडीसी अमरजीत बैंस, डीसीपी नरेश डोगरा।

मेला कमेटी से बैठक के बाद एडीसी अमरजीत बैंस ने बताया कि मेले के दौरान पार्किंग, सुरक्षा, सफाई के अलावा सेहत सहूलियतों का भी इंतजाम रहेगा। इसके अलावा अस्थायी टॉयलेट्स में पानी की निर्विघ्न सप्लाई दी जाएगी। पुलिस की तरफ से सुरक्षा के साथ ट्रैफिक मैनेजमेंट भी किया जाएगा। मेला प्रबंधकों ने भी भरोसा दिया कि मेले में श्रद्धालुओं को कोरोना सावधानियों के बारे में जागरूक किया जाएगा।

बैठक में मौजूद मेला कमेटी के सदस्य व अफसर।
बैठक में मौजूद मेला कमेटी के सदस्य व अफसर।

300 साल पुराना मंदिर, शहर के इतिहास का अभिन्न अंग
श्री सिद्ध बाबा सोढल मंदिर करीब 300 वर्ष पुराना है। मंदिर के श्रद्धालु बताते हैं कि पहले यहां संत की कुटिया, छोटा सा तालाब व घना जंगल था। चड्ढा बिरादरी के जठेरे और आनंद बिरादरी के साथ इस मंदिर का इतिहास जुड़ा है। पंजाब के एकमात्र सिद्ध शक्तिपीठ मां त्रिपुरमालिनी धाम, श्री देवी तालाब मंदिर और मां अन्नपूर्णा मंदिर के साथ श्री सिद्ध बाबा सोढल मंदिर भी शहर के इतिहास का अभिन्न अंग है। जालंधर व पंजाब ही नहीं बल्कि देश व विदेश से भी लाखों लोग मंदिर में दर्शन के लिए आते हैं।

मंदिर में विराजमान श्री सिद्ध बाबा सोढल।
मंदिर में विराजमान श्री सिद्ध बाबा सोढल।

सोढ़ल मंदिर की प्रचलित चमत्कारिक कहानी
यहां कुटिया में रहने वाले संत की चड्ढा परिवार की एक बहू भी सेवक थी। बहू संतान न होने से उदास रहती थी। यह जानकर संत ने कहा कि बेटी तेरे भाग्य में संतान सुख नहीं है। फिर भी भोले भंडारी पर विश्वास रखो। संत ने भोले भंडारी से प्रार्थना की कि उन्हें ऐसा पुत्र रत्न दो, जो संसार में आकर अध्यात्म का मार्ग प्रशस्त करे। संत के आग्रह पर भोले बाबा ने नाग देवता को चड्ढा परिवार की बहू की कोख से जन्म लेने को कहा। जिसके बाद उन्होंने एक बालक को जन्म दिया।

4 वर्ष की उम्र में बालक मां के साथ तालाब पर आया। उसे भूख लगी तो उसने मां को खाना बनाने को कहा। हालांकि मां वहां काम छोड़कर जाने को तैयार न हुई तो बालक ने तालाब में छलांग लगा दी और आंखों से ओझल हो गया। मां रोने लगी तो यह सुनकर बाबा सोढल नाग रूप में तालाब से बाहर आए और कहा कि जो भी मुझे पूजेगा, उसकी सभी मन्नतें पूरी होंगी। ऐसा कहकर नाग देवता के रूप में बाबा सोढल फिर तालाब में समा गए। तब से बाबा व उनके मंदिर के प्रति श्रद्धालुओं का अटूट विश्वास बरकरार है।

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